आलेख : राकेश द्विवेदी
आस्था, लोकगीत और आनंद का संगम
दीपावली के दूसरे दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का पर्व पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इसे अन्नकूट पर्व भी कहा जाता है।विष्णु पुराण, वराह पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र पूजा का विरोध कर गोवर्धन पर्वत की आराधना करने से इस पर्व की शुरुआत हुई। तभी से यह दिन प्रकृति और गौ पूजन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

छत्तीसगढ़ में गौरी-गौरा विवाह उत्सव की धूम
छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव, चौक-चौराहों में यह दिन विशेष रूप से गौरी-गौरा विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह परंपरा विशेष रूप से गोंड़ जनजाति से जुड़ी है, पर अब सभी समाजों में समान उत्साह से मनाई जाती है।दीपावली की संध्या पर महिलाएँ लोकगीत गाते हुए तालाब या नदी से पवित्र मिट्टी लाती हैं। उसी मिट्टी से रात्रि में गौरी (पार्वती) और गौरा (शिव) की प्रतिमाएँ बनाकर चमकीली पन्नियों से सजाई जाती हैं।रात्रि में पीढ़ों पर सजी मूर्तियों को सिर पर रखकर महिलाएँ व पुरुष बाजे-गाजे, नगाड़े और गीतों के साथ गाँव की गलियों से होकर गौरा चौरा तक ले जाते हैं। चौरा को लीप-पोतकर सजाया जाता है।फिर विवाह जैसे रस्में, नेग-चार, और पारंपरिक गौरा गीत गाए जाते हैं। यह लोक-उत्सव पूरी रात गीत, नृत्य और पूजा के साथ चलता है।

विदाई और गोवर्धन पूजा
अगली सुबह, परंपरा अनुसार गौरी-गौरा की विदाई तालाब में विसर्जन के साथ होती है। इसके बाद घर-घर में गोवर्धन पूजा प्रारंभ होती है।गाय के गोबर से शिखरयुक्त गोवर्धन पर्वत बनाकर उसे पुष्पों और वृक्ष-शाखाओं से सजाया जाता है।गायों और पशुधन को नहलाकर, गहनों और मालाओं से सजाकर भगवान श्रीकृष्ण की षोडशोपचार पूजा की जाती है।फिर 56 भोग सहित अनेक व्यंजन बनाकर भगवान को अर्पित किए जाते हैं और पशुधन को भी खिलाया जाता है।छत्तीसगढ़ में इसे देवारी पर्व के नाम से भी जाना जाता है, जो कृषि, पशुपालन और लोकजीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।

राऊत समाज की रौनक : नृत्य, गीत और सुहाई
छत्तीसगढ़ का राऊत समाज (यदु वंशज) इस दिन विशेष रूप से उत्सव मनाता है। वे स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानते हैं। उनकी पोशाक — मोरपंख युक्त पगड़ी, पैरों में घुंघरू और हाथ में लाठी — पूरी तरह श्रीकृष्ण की शैली को दर्शाती है।दशहरा के बाद शुभ मुहूर्त में राऊत समाज दैहान (गाय-बछड़ों के ठहरने के स्थान) में अखरा बनाकर अपने इष्टदेव की स्थापना करता है।लाठी लेकर नाचते-गाते हुए वे रामचरितमानस के दोहे गाते हैं।राऊत लोग हर घर जाकर गायों को सुहाई (पलाश की जड़ और मोरपंख से बना हार) पहनाते हैं, दोहे गाते हैं और आशीर्वाद देते हैं।इसके बदले में लोग उन्हें अन्न, वस्त्र और दक्षिणा भेंट करते हैं।
गोवर्धन खुंदना और लोक-स्नेह
गाँव के अंत में गोवर्धन खुंदना की रस्म होती है, जिसमें गाय-बैल गोबर से बने गोवर्धन पर्वत के ऊपर से गुज़ारे जाते हैं।इसके बाद सभी लोग उसी गोबर से तिलक लगाकर एक-दूसरे को गले मिलते हैं और शुभकामनाएँ देते हैं।यह पर्व केवल पूजा नहीं, बल्कि ग्राम एकता, पशु प्रेम और लोक संस्कृति का संदेश देता है।*परिवार और समाज का मिलन पर्व*इस दिन गाँव-गाँव में हर्ष और उल्लास का वातावरण रहता है। जो लोग रोज़गार या व्यवसाय के लिए दूर-दराज़ रहते हैं, वे भी अपने परिवार सहित गाँव लौटते हैं ताकि देवारी पर्व को अपने मूल निवास में मिलजुलकर मना सकें।गोवर्धन पूजा और गौरी-गौरा उत्सव छत्तीसगढ़ की लोक-आस्था, संस्कृति और समाजिक एकता का अनमोल प्रतीक है — जो आधुनिकता के बीच भी अपनी परंपराओं की सुगंध को जीवित रखे हुए है। “गोवर्धन पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।”



