डॉ. शिरोमणि माथुर की कविता में जिंदगी का सार

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दल्लीराजहरा देश और छत्तीसगढ़ की ख्यातिलब्ध कवियित्री, वरिष्ठ साहित्य साधिका एवं समाजसेविका दल्ली राजहरा निवासी डॉ. शिरोमणि माथुर की नई कविता आई है। “ठूंठ सा जीवन” शीर्षक वाली इस कविता की पंक्तियों में डॉ. माथुर ने हर आदमी के जीवन के सार को पिरोया है। जन मानस को झकझोर देने वाली यह कविता बेहद लोकप्रिय हो रही है। हम अपने पाठकों के लिए डॉ. शिरोमणि माथुर की नई कविता यहां प्रस्तुत कर रहे हैं –

ठूंठ सा जीवन

ठूंठ सा जीवन हुआ है,अब बहारे रूठती है,देख अपनी शक्ल को, अब दरारें दिखती है ।थी कभी बिल्डिंग सुघड़, वो अभी खंडहर हुयी हैपर अभी भी जान बाकी, हिम्मत नहीं कमतर हुयी हैं।काम अब होता नहीं हैं, अनुभव अभी कुछ बड़ गये हैकोई अब सुनता नहीं, सब बड़े अब हो गये है।अब जमाना है बदलता, लोग और परिवेश बदले,बात का लहजा बदलता, अब सभी के वेश बदले।है भलाई चुप रहो अब, भाव के अनुवाद बदले,सब मोबाइल में मगन है, दर्द के संवाद बदले।नाते ऐसे तोड़ते है, जैसे धागा तोड़ते है।फिर अकेले तड़फते है, मन को अपने तोड़ते है।चार पैसे आ गए तो, घर से नाता तोड़ते हैं आ गया संकट कोई तो, जान अपनी छोड़ते हैं।ठूंठ सा जीवन हुआ है, पर न हिम्मत टूटती हैअनुभव हमारे साथ रहता, पर न कश्ती डूबती है।हर उमर आनंद देती, मुस्कुराना आ गया है,हंस कर जीये हैं जिंदगी, मरना हमें अब आ गया है ।

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