लेखक:आशीष सीताशरण सोनी
जगदलपुर छत्तीसगढ़ को यूं ही ‘धान का कटोरा’ नहीं कहा जाता। यहां की उपजाऊ धरती, धान की समृद्ध परंपरा और मेहनतकश अन्नदाताओं ने राज्य की पहचान को विशिष्ट बनाया है। लेकिन जब अन्न उपजाने वाला ही अपनी उपज का उचित मूल्य पाने, समय पर भुगतान कराने और सरकारी व्यवस्थाओं की जटिलताओं से जूझने को विवश हो, तब यह सवाल केवल कृषि का नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय और ग्रामीण विकास का भी बन जाता है। इसी संदर्भ में भारतीय किसान संघ छत्तीसगढ़ द्वारा 27 अक्टूबर को आयोजित ‘अन्नदाता गर्जना रैली’ को अन्नदाताओं की समस्याओं, अधिकारों और अपेक्षाओं को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने के एक महत्त्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।

विगत वर्षों में प्रदेश के अन्नदाता अपने अधिकारों के प्रति अपेक्षाकृत सुप्तप्राय रहे हैं। अधिकारों के प्रति जागरूकता और संगठित होकर अपनी माँगों को प्रभावी ढंग से उठाने की आवश्यकता के बावजूद, प्रदेशव्यापी स्तर पर ऐसी सक्रियता कम दिखाई देती थी। लेकिन पिछले एक वर्ष से भारतीय किसान संघ के सतत प्रयासों ने इस स्थिति में एक नई हलचल पैदा की है। आज छत्तीसगढ़ के अन्नदाता अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग, सक्रिय और संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। वे अपनी समस्याओं को केवल व्यक्तिगत कठिनाई मानकर सहने के बजाय, सामूहिक रूप से उनके समाधान की मांग कर रहे हैं। इसी बदलती चेतना और संगठनात्मक सक्रियता का परिणाम है कि 27 अक्टूबर को राजधानी रायपुर में आयोजित ‘अन्नदाता गर्जना रैली’ में उठी आवाजों से पूरा प्रदेश अन्नदाताओं के अधिकारों की गूंज से गुंजायमान हो उठा। यह रैली केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रदेश के कृषि समाज में बढ़ती अधिकार चेतना और संगठित भागीदारी का प्रतीक भी है।भारतीय किसान संघ के प्रदेश संगठन मंत्री मनीष शर्मा के अनुसार संघ अन्नदाताओं के अधिकारों और उनकी उन्नति के लिए तहसील से जिला और प्रदेश स्तर तक निरंतर प्रयास कर रहा है। उनका कहना है कि अन्नदाताओं के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह वक्तव्य संगठन की उस भूमिका को रेखांकित करता है, जिसके तहत स्थानीय स्तर पर सामने आने वाली कृषि संबंधी समस्याओं को व्यापक मंच पर उठाकर शासन-प्रशासन तक पहुँचाने का प्रयास किया जाता है। हालाँकि, इन प्रयासों की वास्तविक सफलता इस बात से भी तय होगी कि उठाई गई माँगों पर कितना ठोस संवाद होता है और अन्नदाताओं की समस्याओं के समाधान के लिए कितनी समयबद्ध कार्रवाई की जाती है। रैली के माध्यम से सामने रखी गई मांगों में धान का उचित मूल्य, लंबित भुगतान, उपार्जन केंद्रों की व्यवस्था में सुधार, टोकन वितरण की समस्या, तौल में पारदर्शिता, खाद की उपलब्धता और निर्धारित दरों पर बिक्री जैसे विषय प्रमुख हैं। संगठन ने वर्ष 2022-23 से संबंधित लगभग 1,700 करोड़ रुपये के कथित लंबित भुगतान का मुद्दा उठाते हुए धान का मूल्य 3,358 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग भी रखी है। इन आंकड़ों और मांगों को संगठन के दावों के रूप में देखा जाना चाहिए; लंबित राशि, उसके पात्र हितग्राहियों और भुगतान की वर्तमान स्थिति की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। इसी प्रकार, टोकन की संख्या और उपार्जन की समय-सीमा से जुड़ी मांगों का मूल्यांकन वास्तविक कृषि क्षेत्रफल, उपज, भंडारण क्षमता और केंद्रों की कार्यक्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए।अन्नदाता की समस्या को केवल समर्थन मूल्य तक सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। खेती की लागत में बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, डीजल, बिजली, मशीनरी और श्रम का खर्च शामिल है। इसके साथ मौसम की अनिश्चितता, बेमौसम वर्षा, सूखा, कीट-प्रकोप और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का जोखिम भी जुड़ा रहता है। ऐसे में उपज का उचित मूल्य तभी सार्थक होगा, जब भुगतान समय पर हो, फसल का नुकसान होने पर मुआवजा पारदर्शी ढंग से मिले और खेती के लिए आवश्यक संसाधन सुलभ दरों पर उपलब्ध हों। धान उपार्जन की व्यवस्था छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विशेष महत्त्व रखती है। प्रदेश में बड़ी संख्या में परिवारों की आय धान की खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। इसलिए उपार्जन केंद्रों पर लंबी प्रतीक्षा, टोकन संबंधी कठिनाइयाँ, तौल को लेकर विवाद या भुगतान में विलंब सीधे परिवारों के घरेलू बजट, अगली फसल की तैयारी और ग्रामीण बाजार की क्रय-शक्ति को प्रभावित कर सकते हैं। प्रशासन के लिए यह आवश्यक है कि उपार्जन केंद्रों पर शिकायत निवारण की स्पष्ट व्यवस्था हो, तौल और भुगतान के अभिलेख उपलब्ध रहें तथा प्रत्येक शिकायत पर कार्रवाई की स्थिति संबंधित अन्नदाता को बताई जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य और प्रदेश में घोषित अतिरिक्त सहायता के बीच अंतर को भी स्पष्ट रूप से समझना होगा। केंद्र सरकार विभिन्न कृषि उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है, जबकि राज्य सरकार अपनी नीतियों के अनुसार अतिरिक्त सहायता या अन्य प्रोत्साहन दे सकती है। धान का मूल्य निर्धारित करते समय यह सुनिश्चित होना चाहिए कि घोषणा, पात्रता, वास्तविक भुगतान और उपार्जन की प्रक्रिया के बीच कोई अस्पष्टता न रहे। अन्नदाताओं को केवल घोषित दर नहीं, बल्कि उनकी उपज के बदले वास्तव में प्राप्त होने वाली राशि और भुगतान की समय-सीमा भी स्पष्ट रूप से मालूम होनी चाहिए।रैली में अरपा-भैंसाझार सिंचाई परियोजना से संबंधित अधूरे कार्यों, फसल क्षति के मुआवजे, खाद की कथित अधिक कीमत, मक्का और गेहूँ जैसी अन्य फसलों के समर्थन मूल्य पर उपार्जन तथा गौ-संरक्षण से जुड़ी योजनाओं को लेकर भी माँगें उठाई गई हैं। इन विषयों का दायरा धान की खरीद से कहीं व्यापक है। सिंचाई परियोजनाओं में देरी से कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है, जबकि मक्का, दलहन, तिलहन और अन्य फसलों के लिए प्रभावी बाजार व्यवस्था न होने पर फसल विविधीकरण की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं। यदि प्रदेश धान पर निर्भरता कम करते हुए कृषि को अधिक टिकाऊ और विविधतापूर्ण बनाना चाहता है, तो वैकल्पिक फसलों के लिए बीज, तकनीकी मार्गदर्शन, प्रसंस्करण, भंडारण और सुनिश्चित बाजार की व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।कृषि नीति की सफलता केवल अधिक उत्पादन से नहीं मापी जा सकती। भारतीय कृषि में उत्पादन बढ़ाने के साथ मिट्टी की उर्वरता, भूजल की स्थिति, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को भी प्राथमिकता देना आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने भूमि और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव को वैश्विक खाद्य सुरक्षा की प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया है। छत्तीसगढ़ जैसे कृषि और वन-संपदा से समृद्ध प्रदेश के लिए यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है कि कृषि विकास की योजनाएँ स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल हों। जल-संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण, जैविक एवं प्राकृतिक कृषि के उपयुक्त विकल्प और स्थानीय कृषि ज्ञान का वैज्ञानिक मूल्यांकन भविष्य की कृषि नीति के महत्त्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।यहाँ शासन और अन्नदाता संगठनों, दोनों की जिम्मेदारी सामने आती है। संगठन का दायित्व है कि वह समस्याओं को प्रमाणों, स्पष्ट माँगों और प्राथमिकताओं के साथ प्रस्तुत करे; वहीं शासन-प्रशासन को शिकायतों को केवल ज्ञापन या प्रदर्शन तक सीमित न रखते हुए उनके समाधान की समयबद्ध प्रक्रिया सुनिश्चित करनी चाहिए। लंबित भुगतान की जाँच, उपार्जन केंद्रों की क्षमता का आकलन, खाद की कीमतों और उपलब्धता की निगरानी, सिंचाई परियोजनाओं की प्रगति तथा फसल क्षति के मुआवजे की स्थिति पर नियमित सार्वजनिक जानकारी इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं।लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और संगठित माँगें नीति-निर्माण को बेहतर बनाने का माध्यम हैं। भारतीय किसान संघ के प्रयासों से प्रदेश के अन्नदाताओं में बढ़ती सक्रियता इस बात का संकेत है कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक समाज अपनी समस्याओं को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रख सकता है। लेकिन किसी आंदोलन का वास्तविक परिणाम तभी सामने आता है, जब उसके बाद संवाद हो, जिम्मेदारी तय हो और निर्णयों की समीक्षा की जा सके। अन्नदाताओं की समस्याओं का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि स्पष्ट आँकड़ों, पारदर्शी प्रशासन और जवाबदेह व्यवस्था से संभव है।अंततः, ‘धान का कटोरा’ कहलाने वाले छत्तीसगढ़ की समृद्धि का वास्तविक माप केवल धान के उत्पादन या उपार्जन के आँकड़ों में नहीं, बल्कि अन्नदाताओं के जीवन की खुशहाली में भी दिखाई देना चाहिए। ऋग्वेद का मंत्र “अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व” (ऋग्वेद 10.34.13) जुए में मत उलझो, बल्कि खेती करो का संदेश देता है। यह मंत्र कृषि और श्रम की महत्ता को रेखांकित करता है। जो हाथ धरती से अन्न उपजाते हैं, उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य पाने और अपने श्रम के सम्मान के लिए बार-बार संघर्ष न करना पड़े, यह किसी भी संवेदनशील शासन व्यवस्था की प्राथमिकता होनी चाहिए। भारतीय किसान संघ की 27 अक्टूबर की ‘अन्नदाता गर्जना रैली’ ने समूचे प्रदेश को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रदेश के अन्नदाता अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं और अपनी मांगों को संगठित स्वर देने के लिए तैयार हैं। अब शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह इस आवाज को सुने और उठे प्रश्नों का उत्तर केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि ठोस निर्णयों, पारदर्शी व्यवस्था और धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से दे। क्योंकि अन्नदाता का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, उसके श्रम के उचित मूल्य और अधिकारों की सुनिश्चितता से होता है।






