अबूझमाड़ की लौटती धड़कन: घोटुलों में फिर गूंजने लगी मांदर की थाप

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नारायणपुर सुनील कथूरिया सूरज जैसे ही अबूझमाड़ की पहाड़ियों के पीछे ढलता है, जंगलों के बीच बसे गांवों में एक परिचित ध्वनि फिर सुनाई देने लगती है। यह किसी वाहन की आवाज नहीं, किसी सरकारी घोषणा का शोर नहीं और न ही किसी संघर्ष की आहट है। यह है मांदर की थाप—वह थाप जो पीढ़ियों से यहां के आदिवासी जीवन की धड़कन रही है।एक समय था जब शाम ढलते ही गांवों पर सन्नाटा उतर आता था। लोग जल्दी घर लौट आते थे, रास्ते सुनसान हो जाते थे और सार्वजनिक स्थानों पर जुटना जोखिम भरा माना जाता था। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। अबूझमाड़ के कई गांवों में घोटुल फिर आबाद हो रहे हैं। चेलिक और मोटियारिनों की टोलियां पारंपरिक वेशभूषा में गीत गाती हैं, मांदर की लय पर कदम थिरकते हैं और सामूहिक उल्लास का वातावरण बनता है।यह बदलाव केवल सांस्कृतिक गतिविधियों की वापसी नहीं है, बल्कि उस समाज के आत्मविश्वास की वापसी है जिसने वर्षों तक हिंसा, भय और अनिश्चितता का दौर देखा।*घोटुल: केवल एक भवन नहीं, संस्कृति की पाठशाला*बस्तर और अबूझमाड़ की आदिवासी संस्कृति में घोटुल का विशेष महत्व है। यह केवल युवाओं के मिलने-जुलने का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक शिक्षा का केंद्र है। यहां नई पीढ़ी लोकगीत, नृत्य, रीति-रिवाज, अनुशासन, सामुदायिक जीवन और अपनी सांस्कृतिक पहचान को सीखती है।घोटुलों में गूंजने वाले गीत केवल मनोरंजन नहीं होते। उनमें जंगल, नदी, पहाड़, खेती, ऋतु परिवर्तन, प्रेम, संबंध और जीवन के अनुभवों की कथाएं समाहित रहती हैं। मांदर और पारंपरिक वाद्यों की धुन इन कथाओं को जीवंत बना देती है।इसीलिए जब घोटुलों की रौनक लौटती है तो उसका अर्थ केवल नृत्य और संगीत का लौटना नहीं होता, बल्कि पूरी सांस्कृतिक विरासत का पुनर्जीवन होता है।*भय से भरोसे तक का सफर*अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सल हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र बना रहा। संघर्ष का प्रभाव केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों के सामाजिक जीवन पर भी पड़ा।ग्रामीण बताते हैं कि एक दौर ऐसा था जब शाम होते ही लोग अपने घरों में सिमट जाते थे। सार्वजनिक आयोजनों, त्योहारों और सामूहिक कार्यक्रमों में भागीदारी कम हो गई थी। कई गांवों में घोटुलों की गतिविधियां लगभग थम गई थीं।लेकिन हाल के वर्षों में सुरक्षा अभियानों और नक्सल प्रभाव में कमी के बाद परिस्थितियां धीरे-धीरे बदलने लगी हैं। गांवों में आवाजाही बढ़ी है, सामाजिक गतिविधियां फिर शुरू हुई हैं और लोगों के भीतर भरोसा लौटा है। इसी भरोसे की सबसे सुंदर झलक घोटुलों में दिखाई दे रही है।*शाम का नया अर्थ*आज अबूझमाड़ के कई गांवों में शाम का मतलब सन्नाटा नहीं, बल्कि उत्सव है।जैसे ही दिन ढलता है, युवा घोटुल की ओर बढ़ते हैं। मांदर की पहली थाप के साथ वातावरण जीवंत हो उठता है। युवतियां और युवक पारंपरिक नृत्य में शामिल होते हैं। गीतों की स्वर लहरियां दूर तक फैलती हैं। बुजुर्ग बैठकर इस दृश्य को देखते हैं और उनके चेहरे पर संतोष झलकता है।उनके लिए यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी पहचान को फिर से जीवित होते देखने का सुख है।*संस्कृति की वापसी, सामान्य जीवन की वापसी*ग्रामीणों के लिए शांति का अर्थ केवल हिंसा का कम होना नहीं है। इसका अर्थ है खेतों तक निर्भय पहुंचना, बच्चों का स्कूल जाना, बाजारों में चहल-पहल बढ़ना, त्योहारों का खुले मन से आयोजन और सामुदायिक जीवन का फिर से सक्रिय होना।घोटुलों में लौटती भीड़ इसी सामान्य जीवन की वापसी का प्रतीक बन गई है।यहां जुटने वाले युवा केवल गीत और नृत्य नहीं सीख रहे, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ रहे हैं। वे उस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं, जो पीढ़ियों से उनके समाज की पहचान रही है।*केवल सुरक्षा नहीं, विकास भी जरूरी*हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण को स्थायी बनाने के लिए केवल सुरक्षा पर्याप्त नहीं होगी।शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, संचार और युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार भी उतना ही आवश्यक है। साथ ही आदिवासी समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए उनके संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान देना होगा।स्थानीय बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की भागीदारी मिलकर इस सांस्कृतिक पुनर्जीवन को और मजबूत बना सकती है।*मांदर की थाप में छिपा संदेश*अबूझमाड़ के घोटुलों में गूंजती मांदर की थाप केवल एक वाद्य की आवाज नहीं है। यह उस क्षेत्र की बदलती कहानी का संगीत है।यह उन गांवों की उम्मीद है जिन्होंने लंबे समय तक भय और संघर्ष का सामना किया। यह उन युवाओं का उत्साह है जो अपनी सांस्कृतिक पहचान को फिर से जी रहे हैं। यह उन बुजुर्गों की खुशी है जो अपनी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचते देख रहे हैं।आज जब अबूझमाड़ की शामों में मांदर की थाप गूंजती है, तो वह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं होता। वह एक संदेश भी होता है—कि जीवन अपनी स्वाभाविक लय में लौट रहा है, कि संस्कृति फिर सांस ले रही है और कि अबूझमाड़ अपनी पहचान के साथ एक नई सुबह की ओर बढ़ रहा है।घोटुलों की लौटती रौनक दरअसल अबूझमाड़ की लौटती मुस्कान है।

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