मुर्दों के नाम पर हजम कर गए एक लाख रुपए

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उड़ियापाल में कागजों पर बना मुक्तिधाम शेड

1 लाख भुगतान का रिकॉर्ड, जमीन पर शेड का कोई अता-पता नहीं =*-अर्जुन झा

बकावंड जनपद पंचायत बकावंड की ग्राम पंचायतों में 15वें वित्त आयोग मद की राशि को हजम करने का खुला खेल चल रहा है। भ्रष्टाचार में बेशर्मी इस कदर हावी हो चुकी है कि सरपंच, सचिव एवं अधिकारी मुर्दों के नाम पर भी राशि चट करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। ऐसा ही एक बेहद शर्मनाक मामला बकावंड विकासखंड की ग्राम पंचायत उड़ियापाल से सामने आया है, जहां मुक्तिधाम में शेड निर्माण के नाम पर पूरे एक लाख रुपए चट कर लिए गए हैं, मगर शेड का कहीं अस्तित्व भी नहीं है।

उड़ियापाल में 15वें वित्त आयोग की राशि का को लेकर सामने आए इस गड़बड़ी के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। यहां मुक्तिधाम शेड निर्माण के नाम पर हुए कथित भुगतान और आरटीआई से सामने आई जानकारी ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार ई-ग्राम स्वराज के एक्सपेंडिचर डिटेल में वाउचर क्रमांक एक्सवीएफसी/2024-25/P/11, दिनांक 08 अक्टूबर 2024 के तहत “मुक्तिधाम शेड निर्माण कार्य का राशि भुगतान” के नाम से 1 लाख का भुगतान दर्ज दिखाई देता है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जिस मुक्तिधाम शेड के निर्माण के नाम पर यह भुगतान दर्ज है, मौके पर ऐसा निर्माण दिखाई नहीं देता। यही अंतर अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। 15वें वित्त आयोग की राशि का उद्देश्य गांवों में मूलभूत सुविधाओं और विकास कार्यों को मजबूती देना है। लेकिन उड़ियापाल में मुक्तिधाम शेड निर्माण के नाम पर भुगतान का रिकॉर्ड सामने आने के बाद ग्रामीण पूछ रहे हैं कि आखिर जिस कार्य के नाम पर राशि जारी हुई, वह कार्य जमीन पर कहां है? ग्रामीणों का आरोप है कि बिना निर्माण कार्य कराए ही राशि का भुगतान कर दिया गया। उनका यह भी आरोप है कि भुगतान प्रक्रिया में बिल-वाउचर का इस्तेमाल किया गया और पंचायत स्तर पर जिम्मेदार लोगों की भूमिका संदिग्ध है।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।मामले का सबसे अहम पहलू सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी है। ग्रामीणों के अनुसार आरटीआई के माध्यम से पंचायत से मुक्तिधाम शेड निर्माण से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। प्राप्त जवाब में कथित रूप से पंचायत ने इस तरह के कार्य से ही इंकार किया। यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है। क्योंकि एक तरफ ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर मुक्तिधाम शेड निर्माण के नाम के लिए 1 लाख रुपए का भुगतान दर्ज है, तो दूसरी तरफ आरटीआई के जवाब में संबंधित कार्य के संबंध में अलग स्थिति सामने आने का दावा किया जा रहा है।ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर कार्य हुआ था तो आरटीआई में उसकी जानकारी क्यों नहीं?और अगर कार्य नहीं हुआ था तो सरकारी पोर्टल पर भुगतान किस आधार पर दर्ज हुआ?

घेरे में पूर्व सरपंच-सचिव

ग्रामीणों ने इस मामले में पूर्व सरपंच और तत्कालीन सचिव की मिलीभगत के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पंचायत में विकास कार्यों के नाम पर राशि निकाले जाने की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि दस्तावेजों में कार्य पूर्ण दिखाकर भुगतान किया गया है, तो इसकी जांच केवल कागजों तक सीमित न रहकर मौके के भौतिक सत्यापन के साथ की जानी चाहिए। साथ ही भुगतान से जुड़े बिल, वाउचर, संबंधित वेंडर, बैंक भुगतान और कार्य पूर्णता से संबंधित दस्तावेजों की भी जांच की मांग की गई है।ग्रामीणों के मुताबिक इस मामले को लेकर जनपद पंचायत बकावंड के अधिकारियों के समक्ष शिकायत भी की गई। उनका कहना है कि जांच का आश्वासन तो मिला, लेकिन अब तक मामले में कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पंचायत के रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर है तो इसकी जांच में देरी नहीं होनी चाहिए।

2 साल से जांच की मांग

उड़ियापाल के ग्रामीणों ने अब केवल मुक्तिधाम शेड ही नहीं, बल्कि पंचायत में पिछले दो वर्षों के दौरान 15वें वित्त आयोग सहित अन्य मदों से कराए गए सभी कार्यों की जांच की मांग की है। ग्रामीणों की मांग है कि प्रत्येक कार्य का मौके पर भौतिक सत्यापन कराया जाए और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जाए। यदि जांच में राशि के दुरुपयोग या अनियमितता की पुष्टि होती है तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई के साथ सरकारी राशि की वसूली भी की जाए।

देना होगा हिसाब: लखेश्वर कश्यप

आदिवासी समाज के युवा जिला अध्यक्ष लखेश्वर कश्यप ने कहा कि गांवों के विकास के लिए आने वाली राशि ग्रामीणों के हित की राशि है। इसमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई और राशि की वसूली की मांग की।उड़ियापाल का यह मामला अब सिर्फ एक लाख रुपये के भुगतान तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ सरकारी पोर्टल पर मुक्तिधाम शेड निर्माण के नाम पर भुगतान का रिकॉर्ड, दूसरी तरफ मौके पर निर्माण नहीं होने का ग्रामीणों का दावा, और तीसरी तरफ आरटीआई के जवाब में कार्य से कथित इंकार, ये तीनों बातें पूरे मामले को गंभीर बनाती हैं। अब सवाल प्रशासन से है कि क्या इन रिकॉर्डों का मिलान कर वास्तविकता सामने लाई जाएगी? क्या मौके पर भौतिक सत्यापन होगा? और अगर सरकारी राशि का दुरुपयोग प्रमाणित होता है, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी? फिलहाल ग्रामीणों को जांच का इंतजार है और हम इस मामले से जुड़े दस्तावेजों एवं प्रशासनिक कार्रवाई पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

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