शाला भवन जर्जर, किचन शेड तले पढ़ाई, फिर भी नवोदय तक उड़ान

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  •  10 साल से खंडहर हालत में है से भवन, 6 साल से किचन शेड में क्लास
  • नक्सल प्रभावित इलाके के बच्चे समस्याओं के बीच दिखा रहे हैं प्रतिभा 

जगदलपुर प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती, खुद ही निखर कर सामने आ जाती है। जहां चाह, वहां राह की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं धुर नक्सल प्रभावित एक गांव के बच्चे। इस गांव का प्राथमिक शाला भवन करीब 27 साल पहले बना था और 15 साल की उम्र तक पहुंचने से पहले ही यह भवन ढहने की स्थिति में पहुंच गया। खतरे की आशंका को देखते हुए कक्षाएं स्कूल के किचन शेड तले संचालित की जा रही हैं। इतनी बड़ी विडंबना के बीच भी इस स्कूल से ऐसे हीरे निकल कर सामने आ रहे हैं, जो नवोदय विद्यालय तक पहुंचने में कामयाब हो रहे हैं। दूसरी सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय से महज 5 किलोमीटर के फासले पर स्थित इस स्कूल के बच्चों की फिक्र जिले के शिक्षा विभाग के अधिकारियों को जरा भी नहीं है।

यह मामला बस्तर संभाग के बीजापुर जिले से जुड़ा हुआ है। बीजापुर के भोपालपटनम ब्लॉक के ग्राम उल्लूर संजयपारा की शासकीय प्राथमिक शाला बीते 6 वर्षों से किचन शेड में संचालित हो रही है। यह स्कूल विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, लेकिन हालात देखकर यह यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि यह स्कूल विभागीय निगरानी के दायरे में है। इस शाला का मुख्य भवन 1997 में निर्मित हुआ था, लेकिन यह भवन ज्यादा समय तक टिकाऊ नहीं रह पाया। पंद्रह वर्ष की आयु तक पहुंचते पहुंचते स्कूल भवन दम तोड़ने लगा। भवन 10 वर्षों से पूरी तरह जर्जर अवस्था में है। भवन की दीवारों पर दरारें आ चुकी हैं, छत झुक गई है और कभी भी भवन ढह सकता है। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए शाला का संचालन पिछले 6 वर्षों से स्कूल के किचन शेड में किया जा रहा है। स्कूल के प्रधान अध्यापक श्यामनाथ यादव ने बताया कि किचन शेड में पक्की फर्श नहीं है।किचन शेड के नीचे की जमीन की मिट्टी से लिपाई की जाती है, तब कहीं वह बच्चों के बैठने लायक बन पाती है। बारिश के दिनों में शेड के भीतर पानी भर जाता है और बच्चे गीली जमीन पर बैठकर पढ़ने करने को मजबूर हो जाते हैं। यह दृश्य शिक्षा की गुणवत्ता से ज्यादा, बारिश के दिनों में शिक्षा के लिए संघर्ष की मिसाल पेश करता है।

फिर भी बुलंद हैं हौसले 

शाला प्रबंधन समिति और ग्रामीणों ने ग्राम पंचायत के माध्यम से भवन को डिस्मेंटल कर नया निर्माण कराने के लिए विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में कई प्रस्ताव भेजे। इतना ही नहीं सुशासन तिहार में भी ग्रामीणों ने आवेदन दिया, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई। हालात चाहे जैसे भी हों, लेकिन संघर्ष के इस वातावरण में भी उम्मीद की किरण चमकी है। इसी विद्यालय की छात्रा लावन्या कुरगुड़ का चयन जवाहर नवोदय विद्यालय में हुआ है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती, लेकिन उसे पंख देने के लिए न्यूनतम सुविधाएं तो जरूरी हैं।

क्या यही है शिक्षा का अधिकार?

अब सवाल यह उठता है कि क्या एक प्रतिभाशाली बच्चे को ढंग की कक्षा तक नसीब नहीं होनी चाहिए? क्या शिक्षा के अधिकार की असल तस्वीर यही है, जहां किचन शेड ही क्लासरूम बन गया है? क्या यह प्रशासन की लापरवाही और संवेदनहीनता की मिसाल नहीं है? बच्चे कीचड़ और मिट्टी में बैठकर ज्ञान की अलख जगा रहे हैं, शिक्षक जर्जर दीवारों के बीच भविष्य गढ़ रहे हैं, और प्रशासन तमाशबीन बनकर देख रहा है।