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बस्तर में ‘धर्म -युद्ध’ हार गई कांग्रेस

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  • धर्मान्तरण का विरोध न करना भारी पड़ गया सभी प्रत्याशियों को
  • बस्तर के मतदाताओं ने नहीं, आस्था ने हराया कांग्रेस को

अर्जुन झा

जगदलपुर बस्तर संभाग में कांग्रेस चुनाव नहीं, बल्कि धर्म युद्ध में हारी है। कांग्रेस के आला नेताओं द्वारा बस्तर में चल रहे धर्मान्तरण का विरोध न करने की कीमत पार्टी के प्रत्याशियों चुकानी पड़ी है। वहीं धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा यह युद्ध जीत गई। तथाकथित सेक्युलरिज्म के नाम पर विपक्षी गठबंधन के नेताओं द्वारा सत्य -सनातन का अपमान करना भी कांग्रेस को भारी पड़ा है। धर्म निरपेक्षता का मतलब यह नहीं कि अन्य धर्म मजहबों का सम्मान कर एक धर्म विशेष के खिलाफ जहर उगलते रहो। यही भूल कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने की है। यही वजह है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर हिंदू विरोधी होने का तमगा लग गया है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग अंतर्गत नारायणपुर, बस्तर, कोंडागांव, सुकमा, कांकेर, दंतेवाड़ा, बीजापुर सरगुजा जिलों के साथ ही जशपुर, रायगढ़, सरगुजा, अंबिकापुर, कोरबा, धमतरी, राजनांदगांव, मोहला, मानपुर, अंबागढ़ चौकी, कवर्धा, एमसीबी आदि जिलों में भी धर्मान्तरण का खेल लंबे समय से चल रहा है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद छत्तीसगढ़ में धर्मान्तरण को बहुत ज्यादा प्रश्रय मिला है। भाजपा के दिवंगत नेता दिलीप सिंह जूदेव मुखर होकर धर्मान्तरण का विरोध करते और घर वापसी अभियान चलाते रहे। उनकी यह मुहिम आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भाजपा की जड़ें मजबूत करने में सहायक रही। बस्तर में भी कई भाजपा नेता गाहे बगाहे ऐसा ही करते रहे हैं। बस्तर और नारायणपुर जिलों में धर्मान्तरण के खिलाफ आदिवासी समुदाय में अंतर विरोध और संघर्ष की स्थिति निर्मित होती रही है। मूल आदिवासी समुदाय के लोग और उनके समाज प्रमुख धर्मान्तरित आदिवासियों के रीति रिवाजों खासकर अंतिम संस्कार को लेकर विरोध करते रहे हैं। धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासी परिवारों के मृत सदस्यों के अंतिम संस्कार के दौरान कई बार तनावपूर्ण स्थिति भी बस्तर में निर्मित हो चुकी है। कई मामले ऐसे भी आए जबकि पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अफसरों की मौजूदगी में शवों का अंतिम संस्कार संपन्न कराने की नौबत आन पड़ी थी। आदिवासियों के इस अंदरूनी मामले में भाजपा से जुड़े आदिवासी नेता भी कूद पड़े।

फायरब्रांड नेता बन गए केदार कश्यप

नारायणपुर जिले में भाजपा नेता केदार कश्यप और उनके अग्रज दिनेश कश्यप धर्मान्तरण का शुरू से पुरजोर विरोध करते रहे हैं। इस विरोध ने केदार कश्यप की पहचान फायर ब्रांड नेता के रूप में स्थापित कर दी। केदार कश्यप और दिनेश कश्यप के इस तेवर का नतीजा यह हुआ कि आदिवासियों का एक बड़ा तबका उनके साथ हो लिया। वहीं सत्तरुढ़ रही कांग्रेस पार्टी के कई बड़े जिम्मेदार नेता, यहां तक कि मंत्री भी ताल ठोंककर दावा करते थे कि छत्तीसगढ़ में धर्मान्तरण का एक भी मामला नहीं हुआ है। यह बात उन आदिवासियों को नागवार गुजरी, जो अपनी बिरादरी के लोगों के दूसरे धर्म में चले जाने से दुखी रहे हैं। यह नागवारी कांग्रेस के लिए दुश्वारी बन गई। सामाजिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी समुदाय को कांग्रेस से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी। आदिवासियों को नाउम्मीद कर कांग्रेस बड़ी भूल कर बैठी और अपनी उम्मीदों पर उसने खुद पानी फेर डाला। बस्तर के आदिवासी अपनी बिरादरी के लोगों के दूसरे धर्म में पलायन से बड़े दुखी रहे हैं। धर्मान्तरण के कारण सामाजिक अस्तित्व को बचाए रखने की चिंता में पड़े आदिवासियों को केदार कश्यप, दिनेश कश्यप और भाजपा में उम्मीद की किरण नजर आई। कश्यप बंधु चुनाव के कई साल पहले से ही धर्मान्तरण के विरोध में आदिवासियों को लामबंद करने में लग गए थे। इसलिए नहीं कि वे भाजपाई हैं, बल्कि इसलिए कि वे स्वयं भी आदिवासी हैं। अपनी बिरादरी के लोगों को मूल धर्म से विमुख होने से बचाने की चिंता करना केदार कश्यप और दिनेश कश्यप के लिए लाजिमी था। उन्होंने धर्मान्तरण का विरोध करके अपना सामाजिक धर्म ही नहीं निभाया है, बल्कि ‘राज -धर्म’ भी निभाया है। इस धर्म युद्ध में कश्यप बंधु और आदिवासी समुदाय के अन्य प्रमुख जीत की ओर लगातार बढ़ते चले गए। जो आदिवासी पहले कांग्रेस के समर्थक रहे, वे भी कांग्रेस से दामन झटकने लगे।

एक तीर से साध लिए कई निशाने

केदार कश्यप और दिनेश कश्यप ने एक तीर से कई निशाने साध लिए। एक तो अपने समाज के लोगों को भटकने से बचाने में वे कामयाब रहे, दूसरा यह कि आदिवासी बिरादरी को कांग्रेस से विमुख करने में सफल रहे और तीसरा यह कि उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र नारायणपुर के साथ ही पूरे बस्तर में कांग्रेस के आदिवासी वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाकर भाजपा का वोट बैंक और जनाधार काफी बढ़ा लिया। इसकी परिणति नारायणपुर, जगदलपुर, चित्रकोट, कांकेर, दंतेवाड़ा, कोंडागांव, अंतागढ़, केशकाल विधानसभा सीटों पर भाजपा की बंपर जीत के रूप में हुई। बस्तर संभाग की बारह में से चार सीटें ही कांग्रेस बचा पाई। वहीं कांग्रेस के जो आदिवासी नेता विधानसभा जीतने में कामयाब रहे हैं, उन्हें कम मार्जिन से विजय मिली है। बस्तर संभाग की एकमात्र सामान्य विधानसभा सीट पर भी कांग्रेस उम्मीदवार जतिन जायसवाल की अपेक्षा भाजपा प्रत्याशी किरण देव को आदिवासी समुदाय के वोट थोक में मिले हैं। चित्रकोट, दंतेवाड़ा, अंतागढ़, कांकेर, कोंडागांव, केशकाल सीटों पर भी इस धर्म युद्ध की झलक साफ दिखाई दी है।

संस्कार बचाने की थी दरकार

कहते हैं कि जो व्यक्ति या समुदाय अपने संस्कारों से विमुख हो जाता है, वह पूरी बिरादरी के लिए संकट पैदा कर देता है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों की संस्कृति, आस्था स्थलों और पर्व -परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए बहुतेरे जतन किए। करोड़ों रुपए खर्च कर बस्तर संभाग के गांव – गांव में आदिवासियों के पूजा स्थल देवगुड़ी व मातागुड़ियों का जीर्णोद्धार और नई गुड़ियों का निर्माण कराया गया। देव स्थलों के पुजारियों, मोहरियों, बजनियों, सिरहा, गुनिया को मानदेय देने की परिपाटी शुरू की गई। वनभूमि पर निर्मित देवगुड़ियों और मातागुड़ियों के लिए जमीन के अधिकार पत्र जारी किए गए। घोटुलों को पुनर्जिवित किया गया। आदिवासी तीज त्योहारों के आयोजन के लिए अनुदान दिया गया। मगर जिस काम की दरकार थी वह काम नहीं कर पाई कांग्रेस की सरकार। दरअसल आदिवासियों को उनके मूल धर्म से जोड़े रखने के लिए उनमें हो रहे संस्कृति के पराभव को रोकने के लिए उपाय करने थे, जो कांग्रेस की सरकार नहीं कर पाई। बस्तर संभाग में हल्बा, हल्बी, गोंड़, राजगोंड़, भतरा, भतरी, समेत अनेक जातियां आदिवासी समुदाय में समाहित हैं। इन सभी की संस्कृति और संस्कार, रीति रिवाज बड़े ही समृद्ध एवं विशिष्ट हैं। धर्म परिवर्तन के साथ ही संस्कार भी भी बदल जाते हैं। ऐसा ही बस्तर के धर्मान्तरित आदिवासियों के साथ भी हुआ है।

उनका ‘जहर’ भाजपा के लिए अमृत

देशभर के लगभग ढाई दर्जन विपक्षी दलों ने भाजपा के खिलाफ इंडिया गठबंधन खड़ा तो कर लिया, मगर देश की जनता से वे गठबंधन नहीं कर पाए। गठबंधन तैयार होते ही उसमें शामिल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, समाजवादी पार्टी, एडीआईएमके, कम्युनिस्ट व अन्य दलों के नेताओं में हिदुत्व और सनातन धर्म के खिलाफ जहर उगलने की होड़ सी मच गई। कोई सनातन के विनाश की बात कहने लगा, कोई हिंदू और हिदुत्व की अनाप शनाप व्याख्या करने लगा, कोई मंदिर जाने वालों को लड़की छेड़ने वाला बताने लगा तो कोई रामचरित मानस की चौपाइयों की गलत व्याख्या कर सनातन धर्म का अपमान करने लगा। नेताओं द्वारा उगला जाने वाला यह जहर भाजपा के लिए राजनीतिक अमृत बन गया। सनातन और हिंदुत्व पर आस्था रखने वाले लोग ‘मोहब्बत की दुकान’ से उकता गए और उन्हें भाजपा में ही आस दिखने लगी। तीन हिंदी भाषी राज्यों में इसका प्रभाव भी सामने आ गया।

36 घंटे तक कोमा रहे बालक को डॉक्टरों ने दिया नया जीवन

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  •  डेंगू और मलेरिया से पीड़ित बच्चा था बेहोश, 36 घंटे बाद आया होश
  • मेकाज के डॉक्टरों ने ईलाज में दिखाई तत्परता

कोंडागांव जिले के एक बालक को मेकाज के डॉक्टरों ने नया जीवन दिया है। यह बालक 36 घंटे तक कोमा की स्थिति में था और अब तेजी से स्वस्थ होने लगा है।

कोंडागांव जिले के बीरागांव में रहने वाले 13 वर्षीय बालक को अचानक ब्रेन मलेरिया हो गया था। उसे बेहतर उपचार के लिए मेकाज लाया गया। यहां उपचार के दौरान बच्चा डेंगू पॉजिटिव भी पाया गया। बच्चा बेहोश हो गया था। लगातार चिकित्सकों को निगरानी के चलते बालक होश में आने लगा और उठकर बैठ भी गया। अपने कुलदीपक को फिर से जगमगाते देख परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। परिजनों ने इसके लिए चिकित्सकों का धन्यवाद भी ज्ञापित किया। मेकाज के अधीक्षक डॉ. अनुरूप साहू ने बताया कि कोंडागांव के बीरगांव में रहने वाले चमार राम सोरी के 13 वर्षीय बेटे रजनू सोरी को 2 दिसंबर की सुबह सिरदर्द के साथ ही बुखार, पेट दर्द की तकलीफ शुरू हुई थी। परिजन उसे पास के स्वास्थ्य केंद्र ले गए, जहां उसे ब्रेन मलेरिया होना बताया गया। बालक की खराब हालत को देखते हुए उसे मेकाज रेफर किया गया। सुबह 9.30 बजे बालक को मेकाज लाया गया, बच्चे की खराब हालत को देखते हुए तत्काल उसका उपचार शुरू कर दिया गया। उपचार के दौरान अचानक बालक बेहोश हो गया। बच्चे को सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। डॉक्टरों ने उसे 36 घंटे के लिए वेंटिलेटर पर रखवा दिया। जांच के दौरान ही बालक डेंगू से भी पीड़ित पाया गया। बालक ईलाज के दौरान होश में आया। उसे वेंटिलेटर से बाहर निकाल लिया गया। डॉ. डीआर मंडावी, डॉ. पुष्पराज प्रधान, जेआर इंटर्न के अलावा स्टाफ नर्स की मदद से बालक अब ठीक हो गया है।

टांग खिंचाई के चक्कर में डूब गई कांग्रेस की नैया

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  • भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का घोषणा पत्र रहा बीस, फिर भी जनता ने नहीं दिया साथ
  • चंद बड़े नेताओं की स्वार्थ लिप्सा ले डूबी पार्टी को

अर्जुन झा

जगदलपुर चुनावों के पूर्व और चुनावी प्रक्रिया जारी रहने के दौरान छत्तीसगढ़ में बयार कांग्रेस के पक्ष में ही बहती नजर आ रही थी, लेकिन ऐसी कौन सी वजहें थीं कि कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ गया? इस सवाल की तह तक जाने पर कई रहस्ययों पर से पर्दा उठ जाता है। प्रमुख वजह रही कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की एक दूसरे को निपटाने की प्रवृत्ति। इसी प्रवृत्ति ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव, पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू, रविंद्र चौबे, मो. अकबर जैसे धाकड़ नेताओं को हरा दिया। इसके पीछे कौन था, इन नेताओं के उभरने से कांग्रेस के किस नेता को अपने अस्तित्व का खतरा था, इन मसलों पर पार्टी नेतृत्व को न सिर्फ मंथन करना होगा, बल्कि कड़े एक्शन भी लेने होंगे। अन्यथा 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के नतीजे अप्रत्याशित ही नहीं रहे, वरन राजनीति के जानकारों के होश फाख्ता करने वाले भी साबित हुए हैं। निवर्तमान भूपेश बघेल सरकार ने जनता की भलाई के लिए बेहतरीन काम किए, इस बात में शक की कोई गुंजाईश ही नहीं है। किसानों, मजदूरों, महिलाओं, युवाओं, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों समेत सभी वर्गों के हित संवर्धन के लिए ठोस योजनाओं को भूपेश बघेल सरकार ने जमीन पर उतारा था। भूपेश बघेल युवाओं के बीच कका के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे। छत्तीसगढ़ में ‘भूपेश है, तो भरोसा है’ और ‘कका जिंदा हे’ जैसे नारे प्रचलन में आ गए थे। किसान उपज की पर्याप्त कीमत और अंतर राशि मिलने तथा कर्जमाफी से खुश थे। ग्रामीण औद्योगिक पार्को के जरिए उद्यमी बनकर महिलाएं आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो रही थीं और उमंग से भरी थीं। ढाई हजार रु. महीना बेजगारी भत्ता पाकर युवा उत्साहित थे। चार हजार रु. प्रति मानक बोरा की दर से पारिश्रमिक पाकर तेंदूपत्ता श्रमिक आल्हादित थे। महुआ, ईमली समेत तमाम वनोपजों की खरीदी पर्याप्त समर्थन मूल्य पर की जाने और वनभूमि पर काबिज लोगों व निर्मित देव स्थलों को वन अधिकार पट्टे दिए जाने से जंगलों के रखवाले आदिवासी एवं वनवासी उल्लसित थे। भूपेश राज में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग निर्भय होकर जीवन यापन कर रहे थे। यही वजह है कि चुनावों की अधिसूचना जारी होने के पहले तक छत्तीसगढ़ में बस्तर से लेकर कवर्धा और अंबिकापुर तक और राजनांदगांव से लेकर रायगढ़, सरगुजा व कोरबा तक और मोहला, मानपुर, अंबागढ़ चौकी से लेकर जशपुर, जांजगीर तक सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस का जोर और शोर नजर आ रहा था। चुनावों के दौरान भी चारों ओर कांग्रेस का शोर सुनाई दे रहा था। कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने पहुंचे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी की चुनावी सभाओं में उमड़ी भीड़ भी इस बात की तस्दीक करती थी कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की ही लहर है। बस्तर संभाग के जगदलपुर और कांकेर में हुई राहुल गांधी व प्रियंका गांधी की सभाओं में ऐतिहासिक भीड़ देखने को मिली थी। बस्तर की ही धरती से राहुल गांधी ने तेंदूपत्ता की खरीदी 6 हजार रु. प्रति मानक बोरा की दर से करने और हर तेंदूपत्ता श्रमिक परिवार को सालाना चार हजार रु. बतौर बोनस देने की घोषणा की थी। इसकी गूंज सुकमा, कांकेर, कोंडागांव, राजनांदगांव, मोहला मानपुर, अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़, कवर्धा, धमतरी, बालोद, सरगुजा, रायगढ़ आदि तेंदूपत्ता उत्पादक जिलों तक पहुंची थी।

कमतर नहीं था कांग्रेस का घोषणा पत्र

कांग्रेस का चुनावी घोषणा पत्र भाजपा के घोषणा पत्र के मुकाबले जरा भी कमजोर नहीं था, बल्कि भाजपा पर भारी पड़ता प्रतीत हो रहा था। कांग्रेस के घोषणा पत्र में किसानों की कर्जमाफी के साथ ही धान का समर्थन मूल्य 32 सौ रुपए प्रति क्विंटल देने और प्रति एकड़ बीस क्विंटल के मान से धान की खरीदी करने की बात कही गई थी। वहीं भाजपा ने 31 सौ रु. की दर से धान खरीदने की गारंटी दी थी। यानि कांग्रेस धान का मूल्य भाजपा की अपेक्षा 100 रु. ज्यादा देने वाली थी, फिर भी किसानों ने भूपेश और कांग्रेस पर भरोसा क्यों नहीं किया ? उन्होंने मोदी की गारंटी पर ज्यादा यकीन क्यों किया? कांग्रेस की अन्य घोषणाएं भी बीस ही साबित हो रही थीं। बावजूद आम मतदाताओं ने कांग्रेस को क्यों नकार दिया? तेंदूपत्ता श्रमिक भारी भरकम पारिश्रमिक और बोनस राशि से क्यों प्रभावित नहीं हुए? केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा की घोषणा गरीब पालकों और उनकी युवा संतानों को आकर्षित क्यों नहीं कर पाई? मुफ्त ईलाज, दो सौ यूनिट तक मुफ्त बिजली देने का वादा उपभोक्ताओं को क्यों लुभा नहीं पाया? ये तमाम सवाल कांग्रेस को आत्म मंथन के लिए बाध्य कर रहे हैं।

आखिर कौन है कांग्रेस का वह पनौती?

अपनी ठोस और लोक लुभावन घोषणाओं के बावजूद कांग्रेस जनता जानार्दन का दिल जीत नहीं पाई। सरकार में रहते कांग्रेस द्वारा असाधारण काम किए जाने और अगले कार्यकाल के लिए मजबूत इरादों के साथ उतरने के बावजूद मतदाताओं ने कांग्रेस को नकार दिया। कका जिंदा हे, भूपेश है, तो भरोसा है, अबकी बार 75 पार जैसे नारे काफूर हो गए। इससे मन में सवाल उठता है कि कांग्रेस के लिए आखिर पनौती कौन साबित हुआ? जाहिर सी बात है कि यह पनौती कांग्रेस के अंदर ही है। दरअसल कांग्रेस की सबसे बुरी बात यह है कि इस पार्टी के नेता अपनी ही पार्टी के किसी दूसरे नेता को आगे बढ़ते देखना तक फूटी आंख भी पसंद नहीं करते। अपनी लकीर बड़ी करने के बजाय ये नेता सामने वाले की लकीर को मिटाने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। कांग्रेस नेताओं में स्वार्थ लिप्सा इस कदर हावी हो चुकी है कि वे पार्टी हित की चिंता छोड़ स्व हित की चिंता में ज्यादा घुलते रहते हैं। इसी वजह से वे एक दूसरे की टांग खिंचाई में सारी ऊर्जा खपा देते हैं। अपना पार्टी के भीतर और सत्ता में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कांग्रेस के कुछ नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही नेता कांग्रेस के लिए पनौती साबित हो रहे हैं।

बड़े नेताओं को हराने की सुपारी..!

सूत्रों के मुताबिक प्रदेश के ही कांग्रेस के एक बड़े नेता ने राज्य के कई उभरते नेताओं को हराने के लिए अपने चंद खास नेताओं को सुपारी दे रखी थी। इन्हीं सुपारी किलर्स ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे वरिष्ठ नेता टीएस सिंहदेव, पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू, मो. अकबर, अमरजीत भगत, मोहन मरकाम सरीखे धाकड़ नेताओं को हराने में अहम भूमिका निभाई है। सूत्र तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज को बस्तर जिले की चित्रकोट विधानसभा सीट से हराने के लिए बस्तर संभाग से ही आने वाले एक मंत्री और तथा मंडल, निगम व प्राधिकरण में पदों पर आसीन रहे दो नेताओं, एक पूर्व विधायक व कांग्रेस के एक जिला अध्यक्ष को जिम्मेदारी दी गई थी। इन लोगों ने अपने आका के फरमान पर अमल करते हुए दीपक बैज की विजय यात्रा पर विराम लगाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। ऐसा ही हथियार टीएस सिंहदेव समेत प्रदेश की अन्य सीटों से चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के अन्य नेताओं के खिलाफ भी इस्तेमाल किया गया। यदि ये नेता जीत जाते तो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की नजरों में उनका महत्व बढ़ जाता, सीएम पद के लिए आदिवासी, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, ओबीसी व सामान्य वर्ग से कई दावेदार सामने आ जाते। झीरम घाटी नक्सली नर संहार में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं का मारा जाना भी संभवतः इसी वर्चस्व की लड़ाई का अंजाम रहा होगा।

इस खाई को पाटने भाजपा को बनना पड़ेगा दशरथ मांझी

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  • बस्तर के कांग्रेसी कब्जे वाले क्षेत्रों के लोगों का दिल जीतने दिखाना होगा बड़ा दिल
  • जीत लिया पूरा बस्तर, तो जीत लेंगे पूरा छत्तीसगढ़

अर्जुन झा

जगदलपुर भगीरथी की मेहनत और लगन को तो पूरा भारत वर्ष अच्छे से जानता है। ऐसे ही कलयुग में एक भगीरथ पैदा हुए, जिन्हें हम दशरथ मांझी के नाम से जानते हैं। दशरथ मांझी ने अपने गांव के लोगों को जल संकट और दूसरी समस्याओं से मुक्ति दिलाने के लिए अकेले ही पहाड़ का सीना चीर डाला था। कुछ ऐसा ही जतन अब बस्तर में भाजपा को करना पड़ेगा। बस्तर में जो खाई रह गई है, उसे पाटने के लिए भाजपा के नेताओं को दशरथ मांझी बनना पड़ेगा और कांग्रेसी कब्जे वाले बस्तर संभाग के विधानसभा क्षेत्रों के लोगों का दिल जीतने के लिए बड़ा दिल दिखाना होगा। तभी बस्तर में भाजपा के लिए रामराज्य आ पाएगा।

हालिया निपटे विधानसभा चुनावों में बस्तर संभाग की सीटों के नतीजे 75 -25 वाले आए। ये नतीजे भाजपा के लिए उम्मीदों भरे रहे हैं। इस आधी 75 फीसदी उम्मीद को शत प्रतिशत पूरी करने के लिए भाजपा के बड़े नेताओं और यहां से चुने गए विधायकों को वैसा ही कड़ा परिश्रम करना पड़ेगा तथा वैसा ही बड़ा दिल दिखाना होगा जैसा कि बिहार के अनपढ़ ग्रामीण दशरथ मांझी ने किया और दिखाया था। बस्तर की इस पटकथा को पूरा करने के लिए बिहार के एक छोटे से गांव के निवासी बुजुर्ग दशरथ मांझी की कहानी का उल्लेख जरूरी है। बस्तर संभाग की चित्रकोट, जगदलपुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, कांकेर, अंतागढ़ केशकाल और कोंडागांव विधानसभा सीटों पर ही भाजपा फतह कर पाई। बस्तर, बीजापुर, कोंटा सुकमा और भानुप्रतापपुर सीटों पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार है। 2018 के पहले तक बस्तर में भाजपा का एकछत्र साम्राज्य हुआ करता था। 2018 के विधानसभा चुनावों में चली कांग्रेस की आंधी ने भाजपा की चूलें हिलाकर रख दी। बस्तर संभाग की बारह में से एक भी सीट भाजपा जीत नहीं पाई और यहां से भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। संभाग के सुकमा जिले की कोंटा विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अजेय योद्धा कवासी लखमा जीत का छक्का लगाने में कामयाब रहे। बस्तर सीट पर लखेश्वर बघेल कांग्रेस के टिकट पर दूसरी दफे जीतकर आए हैं। बीजापुर में कांग्रेस के विक्रम मंडावी रिपीट हुए हैं। भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट पर उप चुनाव जीतने वाली सावित्री मनोज मंडावी ने यह आम चुनाव जीता है। कांग्रेसी वर्चस्व वाले इन चारों विधानसभा सीटों पर अब भाजपा के नव निर्वाचित विधायकों, सांसदों और नेताओं को विशेष रूप से फोकस करना होगा।

ये है दशरथ मांझी की असल कहानी

बिहार राज्य के निवासी दशरथ मांझी का गांव सड़क, पेयजल, बिजली, चिकित्सा, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित था। पानी की व्यवस्था के लिए भी गांव की महिलाओं को पहाड़ की ऊंची चढ़ाई कर दूसरे गांव में जाना पड़ता था। सड़क के बिना दूसरी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा सक रही थीं। सड़क इसलिए नहीं बन पा रही थी क्योंकि ऊंचा पहाड़ रोड़ा बनकर खड़ा था। कोई ग्रामीण बीमार पड़ जाए, तो फौरी ईलाज मयस्सर नहीं हो पाता था। बच्चे तालीम हासिल नहीं कर पाते थे। अंधेरे में ग्रामीणों को गुजर बसर करना पड़ता था। दशरथ मांझी की पत्नी को भी पानी के इंतजाम के लिए रोज रोज पहाड़ की चढ़ाई करनी पड़ती थी। दशरथ मांझी को अपनी पत्नी और गांव वालों की यह तकलीफ देखी नहीं जाती थी। उसने गांव के विकास में रोड़ा बने पहाड़ की छाती को छलनी करने का फैसला कर लिया। मजबूत इरादों के साथ दशरथ मांझी ने छेनी हथोड़ी लेकर शुरू कर दिया भगीरथी प्रयास। कई साल की मेहनत रंग लाई और दशरथ मांझी पहाड़ को चीरकर सड़क बनाने में सफल हो ही गए। सड़क बनने के बाद पूरे गांव वालों की जीवनचर्या आसान हो गई। दशरथ मांझी की इस बेमिसाल पहल की चर्चा पूरी दुनिया में होने लगी। उनकी इस जानदार जांबाजी पर फीचर फिल्म भी बनी, जो लोकप्रिय रही।

इन्हें निभाना पड़ेगा पड़ोसी धर्म

बस्तर संभाग के आठ भाजपा विधायकों किरण देव जगदलपुर, विनायक गोयल चित्रकोट, केदार कश्यप नारायणपुर, विक्रम उसेंडी अंतागढ़, चैतराम अटामी दंतेवाड़ा, लता उसेंडी कोंडागांव, नीलकंठ टेकाम केशकाल और कांकेर लोकसभा क्षेत्र के सांसद सोहन पोटाई को बड़ा दिल दिखाना होगा। इन सभी को अच्छे पड़ोसी की भूमिका निभाते हुए उन विधानसभा क्षेत्रों के निवासियों की तकलीफ दूर करने और गांवों के विकास पर पूरा ध्यान देना होगा। दलगत भावना से ऊपर उठकर काम करेंगे, तभी भाजपा के लोग इन क्षेत्रों के लोगों का दिल जीत पाएंगे। जगदलपुर के विधायक किरण देव और नारायणपुर के विधायक केदार कश्यप को बस्तर क्षेत्र के गांवों, चित्रकोट के विधायक विनायक गोयल को अपने निर्वाचन क्षेत्र की सीमा से लगे दीगर विधानसभा क्षेत्रों के गांवों, दंतेवाड़ा के विधायक चैतराम अटामी को पड़ोसी जिले बीजापुर और सुकमा के गांवों, कोंडागांव विधायक लता उसेंडी, कांकेर विधायक एवं केशकाल के विधायक नीलकंठ टेकाम को भानुप्रतापपर क्षेत्र के गांवों के विकास के लिए भी समर्पित होकर काम करना पड़ेगा।

संतोष पाण्डेय पर भी बड़ी जिम्मेदारी

बस्तर संभाग की 75 प्रतिशत सीटों पर विजय हासिल करने में भाजपा के प्रदेश प्रभारी ओम माथुर और संभाग प्रभारी एवं राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र के सांसद संतोष पाण्डेय की अहम भूमिका रही है। श्री माथुर और श्री पाण्डेय बस्तर संभाग में विधानसभा चुनावों के कई माह पहले से ही प्रण प्राण से जुट गए थे। उन्होंने सुस्त पड़ चुके पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार किया, उन्हें धरातल पर उतारा। समय समय पर ओम माथुर ने पार्टी नेताओं की बैठकें लेकर उन्हें रिचार्ज किया। वहीं संतोष पाण्डेय संभाग के नेताओं के साथ आदिवासियों के बीच लगातार पहुंचते रहे, उन्होंने आदिवासियों के घरों में बैठकर उनके परिजनों के साथ भोजन किया। इस तरह संतोष पाण्डेय आदिवासियों का दिल जीतने में कामयाब रहे। अब राजनांदगांव का सांसद और पार्टी के बस्तर संभाग प्रभारी होने के नाते संतोष पाण्डेय पर दोहरी जिम्मेदारी आन पड़ी है। बस्तर लोकसभा क्षेत्र के सीमावर्ती दर्जनों गांव राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के मोहला, मानपुर, अंबागढ़ चौकी जिले की सीमा से लगे हुए हैं। अतः श्री पाण्डेय को भी पड़ोसी धर्म निभाना होगा।

इस माह पूर्ण हो जाएगा मल्टी लेवल पार्किंग निर्माण

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  • कलेक्टर विजय दयाराम के. ने लिया मार्केट का जायजा
  • अधिकारियों को दिए कार्य जल्द पूरा करने के निर्देश

जगदलपुर कलेक्टर विजय दयाराम के. ने गुरुवार को संजय बाजार क्षेत्र की व्यवस्थाओं का जायजा लिया। इस निरीक्षण दौरे में उन्होंने लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को इतवारी बाजार में निर्माणाधीन मल्टी लेवल पार्किंग स्थल सह दुकानों के निर्माण कार्यों को दिसंबर माह तक पूर्ण कर लेने के निर्देश दिए। कलेक्टर ने संजय बाजार क्षेत्र का पैदल भ्रमण कर उपस्थित व्यापारियों से चर्चा की। इस दौरान निगम के अधिकारियों को बाजार स्थल में प्रतिदिन साफ सफाई करवाने, ड्रेनेज सिस्टम को व्यवस्थित करने कहा। साथ ही मटन मार्केट, पार्किंग व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए निर्देश भी दिए। इस अवसर पर नगर निगम आयुक्त हरेश मंडावी, लोक निर्माण विभाग के अधिकारी उपस्थित थे।कलेक्टर ने संजय बाजार के मार्केट स्थल में विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कर दुकानों का व्यवस्थित करने और योजना अनुसार बाजार शेड में शिफ्ट करने के निर्देश दिए। साथ ही शौचालय की साफ-सफाई और बाजार की प्रतिदिन साफ सफाई कराने के निर्देश दिए। बाजार परिसर में स्थित बसों की पार्किंग को हटाने के भी निर्देश दिए।

 

निजी स्कूलों के संचालक मिले विधायक किरण देव से

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जगदलपुर निजी स्कूल प्रबंधन संगठन बस्तर का प्रतिनिधि मंडल आज बस्तर विधानसभा क्षेत्र के नव निर्वाचित विधायक किरण देव से मिलकर उन्हें निर्वाचित होने पर बधाई दी। प्रतिनिधि मंडल ने निजी स्कूलों की समस्याओं के संदर्भ में विधायक श्री देव से संक्षिप्त चर्चा भी की। प्रतिनिधि मंडल में संगठन के अध्यक्ष कुलदीप प्रकाश, सचिव नीलोत्पल दत्त, कोषाध्यक्ष सीबी पांडे , उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह, सदस्य अमित देवांगन, अंजनी झा, चंद्रभान सिंह ठाकुर, नीलोफर नबी, अनु सांडिया आदि शामिल थे।

प्रदेश कांग्रेस ने किया बाबा साहेब अंबेडकर का पुण्य स्मरण

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रायपुर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय राजीव भवन रायपुर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं सांसद दीपक बैज के नेतृत्व में संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए पुण्यांजलि अर्पित की गई।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं बस्तर लोकसभा क्षेत्र के सांसद दीपक बैज ने डॉ. अंबेडकर के छायाचित्र पर माल्यार्पण किया। इस अवसर पर प्रभारी महामंत्री संगठन मलकीत सिंह गैदू, कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला, महामंत्री सुबोध हरितवाल, संयुक्त महामंत्री शिवसिंह ठाकुर, अशोक राज आहूजा, प्रदेश सचिव रेहान खान, नंदकुमार पटेल, मेहमूद अली, रोशन सिंह, भवानी मरकाम, सुरेश यादव, मो. सिद्दीक, मतीन खान, अमित मित्तल, रवि शर्मा तथा सेवादल, महिला कांग्रेस, युवा कांग्रेस, एनएसयूआई, इंटक एवं मोर्चा संगठनों, प्रकोष्ठों, विभागों के पदाधिकारी उपस्थित थे।

भाजपा नेताओं ने माना मतदाताओं व पार्टीजनों का आभार

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दल्लीराजहरा भाजपा दल्ली राजहरा मंडल के बूथों में विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुल 12984 वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 8875 मत ही प्राप्त हुए। इस तरह कांग्रेस से भाजपा 4109 बढ़त में रही। दल्ली राजहरा मंडल भाजपा अध्यक्ष राकेश द्विवेदी और महामंत्री द्वय महेंद्र सिंह व मदन माईती ने कहा है कि यह मंडल के सभी वरिष्ठ, ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत का परिणाम है। तीनों नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी दल्ली राजहरा मंडल की ओर से सभी को साधुवाद देते हुए उन्हें नमन किया है और उनके प्रति आभार जताया है। द्विवेदी, सिंग व माईती ने अपेक्षा की है कि सभी पदाधिकारी व कार्यकर्ता इसी तरह पार्टी के प्रति निष्ठा एवं प्रदेश एवं जिला नेतृत्व के निर्देश पर संगठन के कार्यों को अंजाम देते रहेंगे।

सत्ता परिवर्तन के साथ ही आई प्रशासन हरकत में अवैध शराब व चखना दुकानों पर कार्यवाही

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छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी का शासन आते ही पूरे प्रदेश में प्रशासन सक्रिय हुआ अवैध कारोबारी एवं अवैध कब्जों पर धड़ाधड़ कार्रवाई की जा रही है इसी प्रकार दल्ली राजहरा के शराब दुकान के पास कांग्रेस शासन में चल रहे अवैध चखना दुकान का कब्जा खाली कर शराब बेचने वालों पर कार्रवाई की गई सट्टा लिखने वालों पर भी कार्यवाही की जा रही है सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इन शराब चखना दुकानों पर कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का संरक्षण प्राप्त था जिसकी आड़ में उनके द्वारा वसूली की जाती थी। भाजपा सरकार के सत्ता पर आते ही प्रशासन भी प्रशासनिक सर्जरी एवं अवैध कारोबार पर नियंत्रण कर अपना नंबर बढ़ाने में जुटे हुए हैं।

कांग्रेस नेताओं को अब छोड़ना पड़ेगा पदों का तोहफा

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  •  सत्ता परिवर्तन के साथ ही अब शुरू होगी विदाई मुहिम
  • जिस पार्टी ने सब कुछ दिया, उसी को दिया दगा

अर्जुन झा

जगदलपुर सियासत में कुर्सी किसी की सगी नहीं होती। किसी को कुर्सी मतदाता दिलाते हैं, तो किसी को सियासतदां तोहफे में दे देते हैं। मतदाता ने तो अपनी दी हुई कुर्सी कांग्रेस से छीनकर भाजपा के हवाले कर दी है। अब तोहफे में मिली कुर्सी छोड़ने की बारी उन नेताओं की है, जिन्हें उनके आका कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने उपकृत किया था। इन उपकृत नेताओं ने पार्टी का कर्ज उतारने के बजाय पार्टी की ही पीठ में खंजर घोंपने का काम किया है। ऐसे उपकृत नेताओं में बस्तर संभाग के भी करीब आधा दर्जन नेता शामिल हैं। अब इन नेताओं को भी तोहफे में मिले पद छोड़ने पड़ेंगे। नेट

छत्तीसगढ़ की सियासत में बड़ा उलटफेर हो चुका है। 15 साल तक वनवास का दंश झेल चुके कांग्रेस के नेताओं को सन 2018 में बड़ी राहत नसीब हुई थी। तब छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने सत्ता को दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल फेंका और कांग्रेस को के शिखर पर पहुंचा दिया। सालों तक सत्ता के स्वाद से वंचित रहे कांग्रेस के आला नेताओं ने अपने सिपहसालारों को पद रेवड़ी की तरह बांट दिए। अक्षय ऊर्जा विकास निगम, आदिवासी विकास प्राधिकरण, इंद्रावती विकास प्राधिकरण, हस्तशिल्प विकास बोर्ड, हज कमेटी, उर्दू अकादमी, पर्यटन विकास मंडल, माटी कला बोर्ड समेत तमाम निगमों, अकादमी, मंडलों और प्राधिकरणों में अपने चहेतों को पद दिए गए। यह कोई असंवैधानिक कदम नहीं बल्कि राजनीति की परंपरा है। जिस दल की सत्ता होती है, उस दल के लोगों को ऐसे पद उपहार स्वरूप देने की परंपरा छत्तीसगढ़ ही नहीं, अपितु सभी राज्यों में दशकों से चली आ रही है। छत्तीसगढ़ में अब फिर से भाजपा की बारी आ गई है। पूर्ववर्ती सरकार के दौरान जिन कांग्रेस नेताओं को तोहफे में ये पद मिले थे, उन्हें अब ये पद लौटाने होंगे। सत्ता में आते ही भाजपा ने बेदखली अभियान का ऐलान कर दिया है।

अभी चखना सेंटर, आगे….?

सत्ता परिवर्तन के साथ ही राजधानी रायपुर, न्यायधानी बिलासपुर और शिक्षाधानी भिलाई में शराब दुकानों के आसपास संचालित अवैध चखना सेंटरों पर प्रशासन का बुलडोजर एक्शन शुरू हो गया है। पदों से बेदखली का एक्शन भी जल्द शुरू होगा। फिलहाल रायपुर हेड क्वार्टर से इस बाबत लेटर एक्शन शुरू हो चुका है। सूत्र बताते हैं कि फिलहाल मंडलों, निगमों, प्राधिकारणों, अकादमी आदि के अध्यक्षों व सदस्यों को बेदखल किया जाएगा। विभिन्न आयोगों के अध्यक्षों व सदस्यों को कार्यकाल पूरा होते तक पद पर बने रहने दिया जाएगा।

चलता किए जाएंगे बस्तर के ये नेता

नई भाजपा सरकार द्वारा शुरू किए जा रहे ‘बेदखली अभियान’ से बस्तर के आधा दर्जन कांग्रेस नेता प्रभावित होंगे। इन नेताओं में ऊर्जा विकास निगम के अध्यक्ष मिथिलेश स्वर्णकार, इंद्रावती बेसिन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष राजीव शर्मा, सदस्य मलकीत सिंह गैदू, बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष लखेश्वर बघेल, सदस्य विक्रम मंडावी, हस्तशिल्प विकास बोर्ड के अध्यक्ष चंदन कश्यप, उर्दू अकादमी के सदस्य अनवर खान व मदरसा बोर्ड के गफ्फार अली शामिल हैं। अब ये नेता ज्यादा दिनों तक पद का सुख नहीं भोग पाएंगे। उनकी जगह भाजपा समर्थक इन पदों से नवाजे जाएंगे।

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