जगदलपुर. गोंचा महापर्व का शुक्रवार को बाहुडा के रूप में समापन हुआ. रथ यात्रा के दौरान परंपरा अनुसार छुट्टियों से भगवान को तुपकियों से सलामी दी गई.उत्साह पूर्वक बाहुड़ा गोंचा का पर्व बस्तर में मनाया गया.पर्व की शुरआत 16 जुलाई को चंदन जात्रा रस्म से हुई थी. 27 जून को श्रीगोंचा के दिन रथ में सवार होकर जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपनी मौसी के घर जनकपुरी जाते हैं. इसके बाद 9 दिनों तक जनकपुरी प्रति शाम महाआरती होती है. 9 दिनों तक महाआरती और 56 भोग लगाने के बाद वापस भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा तीनों को विशाल रथों में सवार करके वापस जगन्नाथ मंदिर पहुंचाया जाता है. और उनकी मूर्ति को स्थापित किया जाता है. इसे ही बाहुड़ा गोंचा कहा जाता है. शुक्रवार शाम बड़ी संख्या में जनकपुरी सिरासार में भक्तो का सैलाब उमड़ा. भगवान जगन्नाथ स्वामी समेत शुभद्रा जी व बलभद्र के विग्रहो को गाजे बाजे के साथ रथो में आरुढ़ करवाया गया. सिरासार, मिताली चौक व गोलबाजार होते हुए रथ यात्रा श्री मंदिर में विसर्जित हुआ. भगवान की प्रतिमाओं को विधि विधान पूर्वक विराजित किया गया. पर्व के मौके पर 360 घर अरण्य ब्राह्मण समाज की ओर से प्रतिदिन भजन संध्या वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता रहा.



