दल्ली राजहरा। हिंदू सेना उन सभी गणेश समितियां का तहे दिल से आभार व्यक्त करती जिन्होंने पितृ पक्ष से पहले गणेश विसर्जन कर दिया है आपको बता दें कि गणेशोत्सव के समापन के बाद गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन और विभिन्न गणेश समितियों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को लेकर इस बार धार्मिक परंपरा, आयोजन की मर्यादा और कार्यक्रमों के स्वरूप पर चर्चा तेज हो गई है। विशेष रूप से पितृ पक्ष के दौरान गणेश विसर्जन तथा भोग-भंडारे के आयोजन को लेकर धर्म और परंपरा से जुड़े लोगों ने आयोजकों से आत्ममंथन करने की अपील की है।समय पर विसर्जन की मांग पहले भी उठती रहीहिंदू संगठनों तथा ब्राह्मण समाज छत्तीसगढ़ द्वारा समय-समय पर यह मांग उठाई जाती रही है कि गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन गणेशोत्सव की निर्धारित धार्मिक अवधि में ही किया जाना चाहिए। इस वर्ष भी समय पर गणेश विसर्जन किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। इसके पीछे उद्देश्य यही बताया गया कि गणेशोत्सव और पितृ पक्ष दोनों की अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताएं एवं परंपराएं हैं, इसलिए दोनों अवसरों को आपस में मिलाने के बजाय उनकी धार्मिक मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए।गणेश विसर्जन और झांकी का आयोजन अलग-अलग होधर्मावलंबियों का कहना है कि यदि किसी गणेश समिति द्वारा झांकी, सांस्कृतिक कार्यक्रम या सार्वजनिक शोभायात्रा का आयोजन किया जाना है तो उसका समय और स्वरूप पहले से निर्धारित किया जा सकता है। गणेश प्रतिमा का धार्मिक विसर्जन और झांकी का सार्वजनिक आयोजन अलग-अलग रखा जाए, तो धार्मिक परंपरा भी बनी रहेगी और समितियों को भव्य कार्यक्रम करने का अवसर भी मिलेगा। इससे धार्मिक आयोजन और मनोरंजनात्मक कार्यक्रम के बीच स्पष्ट अंतर भी रहेगा।पितृ पक्ष में भोग-भंडारे को लेकर भी चर्चापितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्रद्धा से जुड़ा समय माना जाता है। ऐसे में इस अवधि में सार्वजनिक भोग-भंडारे अथवा अन्य कार्यक्रम आयोजित करने को लेकर लोगों की अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं सामने आ रही हैं। लोगों का कहना है कि किसी भी आयोजन से पहले स्थानीय धार्मिक परंपराओं और विद्वानों की राय लेकर कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए, ताकि किसी की धार्मिक भावना आहत न हो।गणेश समितियों से धार्मिक मर्यादा बनाए रखने की अपीलनगर में विभिन्न गणेश समितियां हर वर्ष श्रद्धा और उत्साह के साथ गणेशोत्सव का आयोजन करती हैं। समितियों द्वारा प्रतिमा स्थापना, पूजा-अर्चना, भजन, झांकी और विसर्जन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हिंदू सेना का कहना है कि समितियों की भूमिका केवल आयोजन कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विसर्जन जुलूस में अनुशासन, धार्मिक वातावरण और सामाजिक मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी भी आयोजकों की होनी चाहिए।विसर्जन केवल डीजे और नृत्य तक सीमित न होगणेश विसर्जन के दौरान डीजे बजाने की परंपरा तेजी से बढ़ी है। डीजे और संगीत अपने आप में आयोजन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि गणेश विसर्जन का मूल उद्देश्य भगवान गणेश को श्रद्धापूर्वक विदाई देना है, न कि इसे केवल डीजे और नृत्य का कार्यक्रम बना देना। तेज ध्वनि, देर रात तक नृत्य और अनियंत्रित भीड़ के कारण कई बार धार्मिक वातावरण प्रभावित होता है।नशे की स्थिति में हुड़दंग पर लगे रोकयह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि विसर्जन में शामिल सभी लोग नशे में नहीं होते और अधिकांश श्रद्धालु पूरी आस्था एवं अनुशासन के साथ कार्यक्रम में शामिल होते हैं। लेकिन कुछ लोगों द्वारा शराब अथवा अन्य नशे की स्थिति में सार्वजनिक स्थानों पर हुड़दंग, अशोभनीय नृत्य अथवा अनुचित व्यवहार किए जाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती हैं। ऐसे मामलों पर आयोजक समितियों और प्रशासन को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।महिलाओं और परिवारों की मौजूदगी का भी रखा जाए ध्यानविसर्जन जुलूस में बड़ी संख्या में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और परिवार शामिल होते हैं। ऐसे में सार्वजनिक स्थान पर ऐसा नृत्य या व्यवहार उचित नहीं माना जा सकता जिससे किसी महिला या परिवार को असहज स्थिति का सामना करना पड़े। आयोजकों को चाहिए कि डीजे और नृत्य के नाम पर होने वाले अशोभनीय प्रदर्शन पर स्वयं नियंत्रण रखें और विसर्जन को पारिवारिक एवं धार्मिक वातावरण में संपन्न कराएं।हिंदूवादी नेताओं से भी आत्ममंथन की अपेक्षाहिंदू धर्म और संस्कृति की बात करने वाले नेताओं तथा संगठनों से भी समाज के लोगों की अपेक्षा है कि वे केवल भाषणों और नारों तक हिंदू संस्कृति की बात सीमित न रखें, बल्कि धार्मिक आयोजनों की तिथि, स्वरूप और मर्यादा में भी उसका पालन दिखाई दे। यदि परंपराओं की रक्षा की बात करनी है तो सबसे पहले धार्मिक आयोजनों में परंपरा और अनुशासन का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यही वास्तविक सांस्कृतिक जिम्मेदारी मानी जाएगी।धर्म के नाम पर दिखावा नहीं, आस्था जरूरीगणेशोत्सव की भव्यता का मूल्यांकन केवल बड़े डीजे, अधिक भीड़, आतिशबाजी अथवा देर रात तक चलने वाले नृत्य से नहीं किया जाना चाहिए। आयोजन की वास्तविक सफलता इस बात में है कि भगवान गणेश की पूजा और विसर्जन श्रद्धा, शांति, अनुशासन तथा सामाजिक सद्भाव के साथ संपन्न हो। धार्मिअब आयोजकों को करना होगा आत्ममंथनगणेशोत्सव आस्था और सामाजिक एकता का पर्व है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि आयोजन समितियां स्वयं तय करें कि उनके कार्यक्रम से समाज को क्या संदेश जा रहा है। हिंदू सेना संगठन बालोद जिला अध्यक्ष नंदा पसीने, संगठन संरक्षक आशा सिंह, मातृशक्ति नगर अध्यक्ष संगीता रजक, मातृशक्ति महामंत्री पुष्पा शांडिल नाम प्रेस विज्ञप्ति जारी किया गया






