खनिज ही नहीं जल का भी अथाह भंडार है बस्तर की धरा के गर्भ में

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  •  इंद्रावती नदी और वनों के कारण जल से समृद्ध है बस्तर का भूगर्भ
  • बस्तर के जिलों में भूजल स्रोतों का उपयोग कम

अर्जुन झा-

जगदलपुर बस्तर संभाग की धरती का गर्भ सिर्फ खनिज संपदा से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि उसमें अथाह जल भंडार भी है। यह संभव हो पाया है पुण्य सलिला इंद्रावती नदी और देवतुल्य वनों की वजह से। अकूत जल भंडार होने के बावजूद यहां भूजल के उपयोग की दर अन्य संभागों या जिलों की तुलना में बहुत ही कम है।

रत्नगर्भा बस्तर की धरती जलगर्भा भी है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में भूजल का सबसे कम उपयोग बस्तर संभाग में होता है। ओड़िशा की धरती को आबाद करती हुई बस्तर की ओर बहने वाली इंद्रावती नदी बस्तरवासियों की जीवनदायिनी है। इसके भरोसे ही बस्तर जिले के हजारों किसान खेती करते हैं। गर्मी के मौसम में नदी का जलस्तर लगातार कम हो जाता है। इस साल स्थिति अभी से ही गंभीर दिखाई दे रही है। किसानों और ग्रामीणों का आरोप है कि बस्तर में वीआईपी दौरे के वक्त और बस्तर विकास प्राधिकरण की बैठक एवं चित्रकोट महोत्सव के दौरान इंद्रावती नदी में बने एनिकेट्स खोल दिए जाते हैं। इस वजह से जमा पानी व्यर्थ बह जाता है और किसान सिंचाई से वंचित हो जाते हैं। इंद्रावती की सहायक नदी के एनिकेट्स भी पुराने हो गए हैं और टूट-फूट चुके हैं। जलगर्भा होने के बावजूद यहां भूजल का दोहन होता है। भूजल का दोहन कम हाेने की वजह से बस्तर भूजल उपलब्धता के मामले में पूरी तरह सुरक्षित माना गया है।

सबसे कम दोहन सुकमा में

सेंट्रल वाटर बोर्ड के सर्वें में यह तथ्य सामने आया है कि बस्तर जिले में 33 प्रतिशत भूजल का उपयोग होता है। वहीं दंतेवाड़ा जिले में 13 प्रतिशत, नारायणपुर में 4.2 और सुकमा में सबसे कम 3 प्रतिशत भूजल का उपयोग लोग करते हैं। पूरे संभाग में कांकेर जिले के सिर्फ चारामा ब्लॉक को ही सेमी क्रिटिकल जोन सर्वे में चिन्हित किया गया है। इस लिहाज से देखा जाए तो इंद्रावती नदी के एनीकेट्स और प्रचुर वन क्षेत्र के कारण बस्तर का भूजल स्रोत सुरक्षित है। यहां के भूजल स्त्रोत का उपयोग कर न सिर्फ बस्तर के लोगों को पेयजल एवं निस्तारी जल संकट बचाया जा सकता है, बल्कि यहां कृषि को भी समृद्ध बनाया जा सकता है

इंद्रावती से है वाटर लेवल मेंटेन

सर्वे के मुताबिक बस्तर बैलाडीला समूह की चट्टानों से आच्छादित है, जहां बैंडेड आयरन फॉर्मेशन प्रचुर मात्रा में है। बैलाडीला समूह की चट्टानों में ग्रेनाइट व ग्रेनाइटॉइड जैसी अम्लीय आग्नेय चट्टानें शामिल हैं। इन मुख्य क्रेटोनिक चट्टानों के निर्माण के अलावा, इंद्रावती समूह की तलछट भी पाई जाती है। जो भू जल के संरक्षण में मददगार होती हैं। जिले का कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण और वार्षिक उपयोग लायक भूजल पुनर्भरण अच्छा है। जिले में सभी उपयोगों के लिए सकल भूजल उपयोग केवल 33.62 प्रतिशत है, जो राज्य के औसत 48.43 प्रतिशत की तुलना में बहुत कम है। जिले के सभी ब्लॉकों को सुरक्षित श्रेणी में रखा गया है।

दंतेवाड़ा तीसरा सबसे कम विकसित जिला

बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में ग्रेनाइटॉइड्स जिसमें डोंगरगढ़ ग्रेनाइट्स और बस्तर गनीस किस्म की चट्टानें हैं। ये बैलाडीला समूह की चट्टानों से ढके हुए हैं, जिसमें बैंडेड आयरन फॉर्मेशन शामिल हैं। यहां शबरी और पाखल समूह के आर्गिलो- कैल्केरियस तलछट भी पाi जाती ह। जिले का कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण, वार्षिक निष्कर्षण योग्य भूजल पुनर्भरण और निष्कर्षण का मात्र 15.4 प्रतिशत है, जो राज्य औसत की तुलना में बहुत कम है। भूजल विकास के मामले में यह राज्य का तीसरा सबसे कम विकसित जिला है। इस जिले में कटेकल्याण ब्लॉक में विकास का सबसे कम चरण 9.64 प्रतिशत है। जिले के सभी ब्लॉकों को सुरक्षित श्रेणी में रखा गया है।

कांकेर में 33 प्रतिशत उपयोग

कांकेर जिला लगभग पूरी तरह ग्रेनाइट चट्टानों से ढका हुआ है। डोंगरगढ़ ग्रेनाइट और बस्तर गनीस प्रमुख भूवैज्ञानिक संरचनाएं हैं। मध्य भाग में बिजली रायोलाइट एक पतली पट्टी के रूप में पाई जाती है। जिले का कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण और वार्षिक निष्कर्षण केवल 33.49 प्रतिशत है।कांकेर के सभी ब्लॉकों को भूजल के मामले में सुरक्षित माना गया है।सिर्फ चारामा ब्लॉक सेमी क्रिटिकल है। खोजपूर्ण ड्रिलिंग से संकेत मिला है बस्तर की धरती में अथाह जल भंडार मौजूद है।