भारत की सभ्यता ने सदियों पहले ही दुनिया को देखने की ऐसी दृष्टि दी थी, जिसमें विचारों, ज्ञान और संवाद के लिए सीमाएं नहीं थीं। ऋग्वेद का सूक्त “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” (ऋग्वेद 1.89.1), अर्थात “हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी और श्रेष्ठ विचार आते रहें”। भारत इसी व्यापक और समावेशी दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। आज बदलती विश्व व्यवस्था के दौर में यही भावना अंतरराष्ट्रीय सहयोग, बहुपक्षवाद और वैश्विक संवाद के संदर्भ में नए अर्थ ग्रहण करती दिखाई देती है। जी-20 शिखर सम्मेलन 2023 के बाद भारत ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं था, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी बना। 2023 में जी-20 की अध्यक्षता के दौरान नई दिल्ली में नेताओं की घोषणा पर सहमति बनी और अफ्रीकी संघ को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। भारत ने उस दौरान वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में अधिक प्रमुखता देने पर भी जोर दिया। 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान भी भारत ने विकास, सहयोग, वैश्विक शासन में सुधार और वैश्विक दक्षिण से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी। ब्रिक्स का इतिहास भारत की भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इसका पहला शिखर सम्मेलन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में हुआ था। भारत ने 2012 में नई दिल्ली में चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की, 2016 में गोवा में आठवें शिखर सम्मेलन की मेजबानी की और 2021 में ब्रिक्स की अध्यक्षता की। 2026 में नई दिल्ली में आयोजित 18वां शिखर सम्मेलन भारत की तीसरी भौतिक मेजबानी और चौथी अध्यक्षता का अवसर बना। इस दौरान ब्रिक्स का स्वरूप भी काफी बदल चुका है। पांच देशों से शुरू हुआ यह समूह अब 11 सदस्य देशों का विस्तारित समूह बन चुका है। इस विस्तारित समूह का वैश्विक महत्व केवल सदस्य देशों की संख्या से नहीं समझा जा सकता। ब्रिक्स के 11 सदस्य देश मिलकर विश्व की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, वैश्विक जीडीपी का करीब 40 प्रतिशत और विश्व व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करते हैं। भौगोलिक दृष्टि से भी इसका विस्तार उल्लेखनीय है। सदस्य देशों का संयुक्त क्षेत्रफल लगभग 4.78 करोड़ वर्ग किलोमीटर है, जो दुनिया की आबाद भूमि के करीब 32 प्रतिशत के बराबर है। यानी ब्रिक्स केवल एक राजनीतिक या आर्थिक मंच नहीं, बल्कि जनसंख्या, भूगोल, संसाधनों और बाजारों के लिहाज से भी एक व्यापक वैश्विक समूह है। यही बदलाव 2026 के ब्रिक्स को विशेष बनाता है। नई दिल्ली घोषणा में राजनीतिक एवं सुरक्षा, आर्थिक एवं वित्तीय तथा सांस्कृतिक एवं जन-से-जन सहयोग इन तीन क्षेत्रों को ब्रिक्स सहयोग के प्रमुख आधार के रूप में रेखांकित किया गया। साथ ही संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, समावेशिता, सहयोग और सहमति को ब्रिक्स की कार्यप्रणाली का आधार बताया गया।सवाल इसलिए उठता है कि क्या यह विस्तारित ब्रिक्स भारत को आकार दे रहा है या भारत इस नए ब्रिक्स को अपनी प्राथमिकताओं के अनुरूप दिशा देने का प्रयास कर रहा है? इसका उत्तर किसी एक पक्ष में देना आसान नहीं है। वास्तव में दोनों प्रक्रियाएं एकसाथ चल रही हैं। ब्रिक्स बदल रहा है और भारत भी उस बदलाव के बीच अपनी भूमिका को नए तरीके से परिभाषित कर रहा है।भारत की 2026 की अध्यक्षता केवल दो दिन के शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं रही। प्रधानमंत्री के अनुसार, अध्यक्षता के दौरान 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए तथा लगभग 30 शहरों में ब्रिक्स से जुड़े कार्यक्रम हुए। आधिकारिक पृष्ठभूमि दस्तावेज के अनुसार, इन बैठकों में राजनीतिक-सुरक्षा, आर्थिक-वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जन-से-जन सहयोग के तीनों क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाया गया। यहीं भारत की सम्मेलन-संचालन क्षमता दिखाई देती है अर्थात अलग-अलग हित रखने वाले देशों को एक मंच पर लाकर बातचीत की जमीन तैयार करने की क्षमता। ब्रिक्स के सदस्य देशों के हित हर मुद्दे पर समान नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा और व्यापार से जुड़े प्रश्न हैं। रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। पश्चिम एशिया के संदर्भ में ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के अपने अलग-अलग हित हैं। अफ्रीकी देशों की प्राथमिकताओं में विकास, वित्त, खाद्य सुरक्षा और अवसंरचना जैसे विषय प्रमुख हैं। ऐसे विविध हितों के बीच साझा मंच पर बातचीत बनाए रखना अपने आप में कूटनीति की बड़ी चुनौती है। 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की बैठक इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण रही। दोनों नेताओं ने कहा कि मतभेद विवाद में नहीं बदलने चाहिए और संबंधों को दीर्घकालिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। भारत ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता को संबंधों के विकास का महत्वपूर्ण आधार बताया। व्यापार असंतुलन, आपूर्ति शृंखला और बाजार पहुंच जैसे आर्थिक विषयों पर भी चर्चा हुई। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत और चीन के सभी मतभेद समाप्त हो गए हैं। बल्कि इसका महत्व इस बात में है कि मतभेदों के बावजूद संवाद का रास्ता खुला रखा गया। कूटनीति में हर समस्या का तत्काल समाधान संभव नहीं होता। कई बार उसका पहला उद्देश्य ही यह होता है कि असहमति को टकराव में बदलने से रोका जाए और बातचीत के लिए जगह बनी रहे। इसे समझने के लिए भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा उपयोगी है। सरल शब्दों में इसका अर्थ है कि भारत अपने महत्वपूर्ण विदेश नीति संबंधी निर्णय अपने राष्ट्रीय हित और परिस्थितियों के आधार पर स्वतंत्र रूप से ले। विदेश मंत्रालय भी भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्यों में रणनीतिक स्थान और स्वायत्तता को रेखांकित करता है। एक दूसरी अवधारणा है बहु संरेखण। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत हर देश के साथ समान संबंध रखता है, बल्कि यह कि वह अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग कर सकता है। अमेरिका के साथ तकनीक और रक्षा, रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा, पश्चिम एशिया के साथ व्यापार एवं निवेश और ब्रिक्स के भीतर चीन सहित अन्य देशों के साथ आर्थिक तथा बहुपक्षीय सहयोग- ये सभी संबंध एक-दूसरे को अनिवार्य रूप से समाप्त नहीं करते।यही भारत की कूटनीति की व्यावहारिक विशेषता है। भारत कई देशों के साथ एक साथ संबंध रखता है, लेकिन हर संबंध का अपना संदर्भ और अपना हित है। इसलिए किसी एक देश के साथ भारत की निकटता को दूसरे देश के साथ उसके संबंधों के चश्मे से देखना हमेशा सही नहीं होगा।2023 के जी-20 और 2026 के ब्रिक्स को साथ रखकर देखें तो वैश्विक दक्षिण का प्रश्न भी लगातार सामने आता है। जी-20 के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाया गया और भारत ने विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक आर्थिक विमर्श में अधिक स्थान देने पर जोर दिया। 2026 के ब्रिक्स में भी वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और विकासशील देशों की भागीदारी का प्रश्न प्रमुख रहा। प्रधानमंत्री ने वैश्विक दक्षिण को केवल नियमों का पालन करने वाला पक्ष न रहकर नियमों को आकार देने वाली भूमिका की ओर बढ़ने की बात कही। आर्थिक क्षेत्र में भी ब्रिक्स के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। दुनिया में बढ़ते संरक्षणवाद, एकतरफा शुल्क और व्यापारिक बाधाओं के बीच भारत की अध्यक्षता में व्यापार मंत्रियों की बैठक में विश्व व्यापार संगठन को केंद्र में रखते हुए बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था, व्यापार में संतुलन, सेवाओं के व्यापार और अधिक लचीली एवं विविध आपूर्ति शृंखलाओं पर जोर दिया गया। साथ ही छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए व्यापार वित्त तक पहुंच बढ़ाने के लिए जयपुर सहमति जैसे प्रयास सामने आए।स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान का विषय भी ब्रिक्स की चर्चा में महत्वपूर्ण रहा है। इसे किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा की स्थापना या डॉलर को तुरंत हटाने की योजना के रूप में देखना उचित नहीं होगा। अधिक व्यावहारिक प्रश्न यह है कि सदस्य देश आपसी व्यापार में भुगतान की लागत और जोखिम कैसे कम करें तथा अपनी-अपनी मुद्राओं के इस्तेमाल और भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग को कैसे बढ़ाएं। यहां ब्रिक्स की सफलता का वास्तविक परीक्षण घोषणाओं से आगे होगा। यदि आर्थिक सहयोग व्यापार सुविधा, भुगतान व्यवस्था, निवेश, आपूर्ति शृंखला और विकास परियोजनाओं में दिखाई देता है, तो उसका प्रभाव अधिक ठोस होगा। केवल घोषणाएं अपने आप में पर्याप्त नहीं होंगी।कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन जैसे विषय भी अब ब्रिक्स के व्यापक एजेंडे का हिस्सा हैं। भारत की अध्यक्षता के दौरान उद्योग, व्यापार, संचार, श्रम, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और अन्य क्षेत्रों में कई मंत्रीस्तरीय बैठकें हुईं। उदाहरण के लिए, उद्योग मंत्रियों की बैठक में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों, स्टार्टअप, सौर ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स पर सहयोग की पहल सामने आई, जबकि संचार मंत्रियों की बैठक में डिजिटल अवसंरचना, साइबर सुरक्षा, डिजीटल कौशल और नवाचार पर चर्चा हुई। इससे स्पष्ट है कि ब्रिक्स केवल भू-राजनीति की चर्चा का मंच नहीं रह गया है। ब्रिक्स में संवाद केवल सरकारों के स्तर पर भी नहीं होता। ब्रिक्स के भीतर व्यापार, शोध, शिक्षा, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के स्तर पर भी संवाद की व्यवस्थाएं विकसित हुई हैं। नई दिल्ली घोषणा में विभिन्न संस्थागत और गैर-सरकारी मंचों के योगदान को भी मान्यता दी गई है। यह प्रक्रिया सरकारी कूटनीति के समानांतर विचार और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान की जगह बनाती है। भारत की कूटनीति में शिखर कूटनीति भी महत्वपूर्ण है अर्थात शीर्ष नेताओं की सीधी बातचीत के माध्यम से संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों पर संवाद। लेकिन केवल शीर्ष नेताओं की बैठक को ही पूरी कूटनीति मानना उचित नहीं होगा। उसके पीछे अधिकारियों, विशेषज्ञों, मंत्रिस्तरीय बैठकों और संस्थागत संवाद की लंबी प्रक्रिया होती है। भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता में वर्षभर हुई बैठकों की बड़ी संख्या इसी व्यापक प्रक्रिया की ओर संकेत करती है।इसीलिए भारत की भूमिका को केवल “नेतृत्व” के दावे से समझना पर्याप्त नहीं होगा। महत्वपूर्ण यह है कि भारत अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच साझा जमीन कितनी प्रभावी ढंग से तैयार कर पाता है। यही मुद्दा-आधारित सहयोग की भावना है। हर विषय पर समान राय होना जरूरी नहीं, लेकिन जिस मुद्दे पर साझा हित हो, वहां साथ काम किया जा सकता है।ब्रिक्स को केवल पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। इसके सदस्य देशों के हित अनेक मुद्दों पर अलग हैं और कई बार एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धी भी हैं। ब्रिक्स की वास्तविक भूमिका शायद इस बात में अधिक है कि वह ऐसे देशों को एक मंच देता है जो वैश्विक शासन, व्यापार, विकास और वित्तीय व्यवस्था में अधिक प्रभाव चाहते हैं। तो क्या भारत ब्रिक्स को गढ़ रहा है? इसका अंतिम उत्तर देना अभी भी जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान वैश्विक दक्षिण, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, आर्थिक सहयोग, तकनीक, सतत विकास और संवाद जैसे विषयों को प्रमुखता दी। नई दिल्ली घोषणा ने भी राजनीतिक-सुरक्षा, आर्थिक-वित्तीय तथा सांस्कृतिक-जन-से-जन सहयोग के तीनों क्षेत्रों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। दूसरी ओर, ब्रिक्स की दिशा केवल भारत तय नहीं कर सकता। चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य सदस्य देशों के अपने राष्ट्रीय हित हैं। इसलिए भारत की कूटनीतिक भूमिका को सबसे उचित रूप से इस रूप में देखा जा सकता है कि वह अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच साझा जमीन तलाशने और संवाद को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। जी-20 2023 और ब्रिक्स 2026 के बीच यही निरंतरता दिखाई देती है। 2023 में भारत ने एक व्यापक वैश्विक आर्थिक मंच पर सहमति बनाने और अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। 2026 में उसने एक अधिक विस्तारित और विविध समूह की अध्यक्षता करते हुए वैश्विक दक्षिण, आर्थिक सहयोग और वैश्विक शासन सुधार जैसे प्रश्नों को आगे रखा। इसलिए शायद मूल प्रश्न का उत्तर यह नहीं है कि ब्रिक्स भारत को गढ़ रहा है या भारत ब्रिक्स को। वास्तविकता यह है कि दोनों एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। बदलता ब्रिक्स भारत की विदेश नीति के लिए नए अवसर और नई चुनौतियां पैदा कर रहा है, जबकि भारत अपनी प्राथमिकताओं और कूटनीतिक अनुभव के माध्यम से इस मंच के विमर्श को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है।आखिरकार किसी भी शिखर सम्मेलन की सफलता केवल तस्वीरों, भाषणों या घोषणाओं से तय नहीं होती। उसका वास्तविक मूल्य इस बात से सामने आता है कि उसके बाद व्यापार कितना बढ़ता है, आर्थिक सहयोग कितना गहरा होता है, विकासशील देशों की आवाज कितनी प्रभावी होती है और मतभेदों के बावजूद संवाद की परंपरा कितनी मजबूत होती है। नई दिल्ली में 2026 का ब्रिक्स इसी कसौटी पर भारत की बदलती कूटनीतिक भूमिका का अगला अध्याय है।