काछन देवी की सवारी बनने वाली बालिका की जगह दूसरी बच्ची को राष्ट्रपति से मिलवाया
जोगी विधान से लेकर मुरिया दरबार तक की व्यवस्थाओं पर निशाना =
जगदलपुर बस्तर जिला कांग्रेस कमेटी शहर अध्यक्ष सुशील मौर्य ने विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी आदिवासी परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और पारंपरिक विधानों के साथ कथित छेड़छाड़ को लेकर भाजपा सरकार और शासन-प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की आदिवासी संस्कृति, जनआस्था, देवी-देवताओं और सदियों से चली आ रही परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। लेकिन भाजपा सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली ने इस ऐतिहासिक महोत्सव की गरिमा और परंपराओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुशील मौर्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बस्तर दशहरा की शुरुआत से पहले जिस काछन देवी से अनुमति लेने की परंपरा है, उसी परंपरा से जुड़ी देवी की सवारी बनने वाली बालिका के स्थान पर किसी दूसरी बच्ची को राष्ट्रपति से मुलाकात कराने का मामला सामने आया है। यदि परंपरा से जुड़े वास्तविक पात्रों की जगह दूसरे लोगों को प्रस्तुत किया जाएगा, तो यह बस्तर की आस्था और सांस्कृतिक पहचान के साथ अन्याय है। भाजपा सरकार और प्रशासन को पनका समाज के समक्ष इसका जवाब देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर बस्तर दशहरा आस्था और परंपराओं का पर्व है या भाजपा सरकार का निजी आयोजन? क्या अब सदियों से चली आ रही परंपराओं का निर्धारण समाज की आस्था और पारंपरिक मान्यताओं के बजाय सत्ता में बैठे लोगों की सुविधानुसार किया जाएगा? भाजपा सरकार को यह समझना होगा कि बस्तर की संस्कृति किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं, बल्कि यहां के आदिवासी समाज की ऐतिहासिक विरासत है।सुशील मौर्य ने कहा कि बस्तर दशहरा के दौरान रथ परिक्रमा में पहिया टूटने की घटना के बाद प्रशासन द्वारा जेसीबी से रथ खिंचवाए जाने पर आदिवासी समाज ने परंपराओं के विरुद्ध होने की बात कहते हुए विरोध जताया था। लेकिन परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं को लेकर उठाए गए सवालों का संवेदनशीलता से समाधान करने के बजाय प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किए जाने की बात सामने आई। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन लोगों की आस्था और सहभागिता से बस्तर दशहरा की पहचान बनी हुई है, उन्हीं की भावनाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। सुशील मौर्य ने कहा कि बस्तर दशहरा की व्यवस्थाएं संभालने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल आयोजन पूरा कराना नहीं, बल्कि इसके प्रत्येक पारंपरिक विधान की पवित्रता और गरिमा बनाए रखना भी है।
जोगी परिवार को हटाने पर रोष
शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने बस्तर दशहरा के महत्वपूर्ण जोगी विधान से जुड़े दौलत नाग और उनके परिवार को सिरहासार भवन से हटाए जाने के मामले पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के दौरे और मुरिया दरबार की तैयारियों का हवाला देते हुए जोगी विधान निभाने वाले परिवार को दशहरा संपन्न होने से पहले ही सिरहासार भवन से हटा दिया गया। परिवार का आरोप है कि उन्हें इस कार्रवाई से पहले कोई सूचना या नोटिस नहीं दिया गया। अचानक हटाए जाने के कारण उन्हें अपने गांव लौटना पड़ा और वे बस्तर दशहरा के कुछ महत्वपूर्ण पारंपरिक विधानों में हिस्सा नहीं ले सके। सुशील मौर्य ने कहा कि जोगी विधान बस्तर दशहरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठान है। इस परंपरा को जोगी परिवार पीढ़ियों से कठिन तपस्या, उपवास और अटूट आस्था के साथ निभाता आ रहा है। ऐसी परंपरा से जुड़े परिवार को आवश्यक विधानों की पूर्णता से पहले हटाना उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए भवन की व्यवस्था करनी थी, तो प्रशासन को पहले से संवाद स्थापित कर सम्मानजनक समाधान निकालना चाहिए था।
मुआवजे पर सवाल
सुशील मौर्य ने भीतर रैनी की रस्म के दौरान रथ के पहिए के नीचे आने से एक ग्रामीण की मौत और दूसरे ग्रामीण के घायल होने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अत्यंत दुखद और गंभीर मामला है। उन्होंने आरोप लगाया कि मृतक के परिवार को अब तक शासन-प्रशासन की ओर से मुआवजा नहीं दिया गया है। उन्होंने सवाल किया कि विश्व प्रसिद्ध आयोजन की भव्यता और व्यवस्थाओं पर ध्यान देने वाला प्रशासन हादसे में जान गंवाने वाले ग्रामीण के परिवार की पीड़ा के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं है? क्या बस्तर के आदिवासी ग्रामीणों का जीवन और उनके परिवारों का दुख प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है? कांग्रेस ने मांग की कि घटना के संबंध में स्थिति स्पष्ट की जाए, पीड़ित परिवार को नियमानुसार उचित मुआवजा दिया जाए और भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
मुरिया दरबार 8 मिनट में खत्म
सुशील मौर्य ने कहा कि बस्तर दशहरा के महत्वपूर्ण पारंपरिक आयोजन मुरिया दरबार को कथित तौर पर महज आठ मिनट में समाप्त कर दिया गया। यह भी सवाल उठे कि मांझी-चालकी सहित पारंपरिक प्रतिनिधियों को राष्ट्रपति के समक्ष क्या बोलना है, इसकी स्क्रिप्ट एक दिन पहले ही अधिकारियों द्वारा उपलब्ध करा दी गई थी। उन्होंने कहा कि मुरिया दरबार आदिवासी समाज की परंपराओं, समस्याओं, अपेक्षाओं और सामुदायिक संवाद का महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे आयोजन को निर्धारित समय में औपचारिकता पूरी करने तक सीमित कर देना उसकी ऐतिहासिक और सामाजिक महत्ता को कम करता है। सुशील मौर्य ने सवाल किया कि यदि पारंपरिक प्रतिनिधियों को अपनी बात भी अधिकारियों की तैयार की गई स्क्रिप्ट के अनुसार रखनी पड़े, तो फिर आदिवासी समाज की वास्तविक आवाज और समस्याएं देश की राष्ट्रपति तक कैसे पहुंचेंगी? राष्ट्रपति का दौरा बस्तर की संस्कृति, समस्याओं और वास्तविकताओं से परिचित कराने का अवसर होना चाहिए था, न कि केवल निर्धारित कार्यक्रमों की औपचारिक प्रस्तुति का माध्यम।
परंपराओं का गलत चित्रण
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बस्तर प्रवास के दौरान बस्तर दशहरा की परंपराओं को प्रस्तुत करने के तरीके पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। उनके अनुसार, लालबाग में काछन देवी की परंपरा को जिस तरह प्रदर्शित किया गया, उस पर स्थानीय परंपराओं से परिचित लोगों ने आपत्ति जताई है। काछन देवी से जुड़ी पारंपरिक रस्म और उसके वास्तविक स्वरूप को लेकर प्रस्तुतिकरण में अंतर होने के आरोप सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार राष्ट्रपति के सामने प्रदर्शित एआई से तैयार चित्रों में भी ऐसी आकृतियां और दृश्य दिखाई दिए, जिनका बस्तर दशहरा की वास्तविक परंपराओं से मेल होने पर सवाल उठे।श्री मौर्य ने कहा कि बस्तर दशहरा के रथ का पारंपरिक स्वरूप मंदिरनुमा नहीं, बल्कि दो मंजिला आयताकार संरचना वाला होता है। दंतेवाड़ा से माता की डोली और छत्र बस्तर लाए जाने की परंपरा है। इसी तरह बेल जात्रा में राजा द्वारा बेल को अपने हाथ में लेकर आने की परंपरा का अपना विशिष्ट महत्व है। ऐसे में यदि इन परंपराओं को गलत चित्रों या भ्रामक प्रस्तुतिकरण के माध्यम से दिखाया जाएगा, तो देश-दुनिया में बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को लेकर गलत संदेश जाएगा।
भाजपा सरकार से सवाल
सुशील मौर्य ने कहा कि रथ परिक्रमा की घटना, जोगी परिवार को हटाने का मामला, भीतर रैनी में ग्रामीण की मौत, मुरिया दरबार की संक्षिप्त अवधि और राष्ट्रपति के सामने परंपराओं के कथित गलत चित्रण जैसी घटनाएं अलग-अलग नहीं देखी जा सकतीं। ये सभी बस्तर दशहरा के आयोजन और उसके पारंपरिक स्वरूप को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार एक ओर आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर बस्तर की पहचान से जुड़े आयोजनों में ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनसे स्थानीय समाज की भावनाएं आहत होने की शिकायतें उठ रही हैं। सरकार को केवल आयोजन की भव्यता और प्रचार पर ध्यान देने के बजाय परंपराओं की वास्तविक गरिमा, पारदर्शिता और आदिवासी समाज के सम्मान को प्राथमिकता देनी चाहिए। सुशील मौर्य ने मांग की कि काछन देवी की परंपरा से जुड़े मामले पर स्थिति स्पष्ट की जाए, पनका समाज और अन्य संबंधित पारंपरिक समुदायों की आपत्तियों का समाधान किया जाए, जोगी परिवार को हटाने की कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा हो, भीतर रैनी की घटना में प्रभावित परिवार को उचित मुआवजा मिले और राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किए गए सांस्कृतिक चित्रण की भी जांच कराई जाए। शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुशील मौर्य ने कहा कि बस्तर दशहरा कोई राजनीतिक इवेंट नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा, आदिवासी समाज की आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत है। इसे राजनीतिक प्रचार और प्रशासनिक मनमानी का माध्यम बनाना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। भाजपा सरकार और शासन-प्रशासन को बस्तर की जनता तथा पारंपरिक समाज के सामने जवाब देना होगा कि आखिर हमारी ऐतिहासिक परंपराओं के साथ इस तरह का व्यवहार क्यों किया जा रहा है? प्रेसवार्ता में ग्रामीण अध्यक्ष प्रेमशंकर शुक्ला, वरिष्ठ नेता उमाशंकर शुक्ला, पूर्व विधायक रेखचंद जैन, नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष राजेश चौधरी, जिला उपाध्यक्ष लेखन बघेल, गौरनाथ नाग, ब्लॉक अध्यक्ष संतोष सेठिया, महामंत्री अभिषेक नायडू, किसान कांग्रेस अध्यक्ष दयाराम कश्यप आदि मौजूद रहे।











