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सुरक्षा के नाम पर डकार गए 10 लाख और बचा नहीं पाए बेशकीमती चंदन के पेड़ भी

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बस्तर का चंदन वन खत्म होने की कगार पर

2 हजार से घटकर रह गए सिर्फ 200 पेड़

यहां तो विभागीय कर्मी ही निभा रहे हैं चंदन तस्कर वीरप्पन की भूमिका

अर्जुन झा

जगदलपुर कर्नाटक के कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन ने दशकों तक वन महकमे और पुलिस की नाक में दम किए रखा था। उसने बड़े पैमाने पर चंदन पेड़ों का सफाया कर दिया था। अब बस्तर में भी कोई वीरप्पन पैदा हो गया है, जो बस्तर जिले में चंदन के जंगलों का सफाया कर रहा है। जिस जंगल में कभी चंदन के दो हजार से भी ज्यादा पेड़ खुशबू बिखेर रहे थे, अब उस जंगल में 200 पेड़ भी नहीं बचे हैं। दरअसल यहां वीरप्पन कोई और नहीं बल्कि विभागीय अधिकारी कर्मचारी ही हैं। अधिकारी चंदन के जंगल की सुरक्षा के नाम पर दस लाख डकार गए, मगर पेड़ नहीं बचा पाए।

बस्तर जिले के बड़े आरापुर स्थित दुर्लभ प्राकृतिक सफेद चंदन वन पर अब अस्तित्व का संकट गहरा गया है। कभी अपनी प्राकृतिक समृद्धि और हजारों चंदन वृक्षों के लिए पहचाने जाने वाला यह क्षेत्र आज धीरे-धीरे इतिहास बनने की कगार पर पहुंच चुका है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यहां पहले 2 हजार से अधिक सफेद चंदन के पेड़ मौजूद थे, लेकिन अब मुश्किल से 200 वृक्ष ही बचे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से सक्रिय चंदन तस्करों ने जंगल और गांव के आसपास लगे अधिकांश पेड़ों को काट डाला है। तस्करों ने केवल जंगल क्षेत्र ही नहीं, बल्कि आरापुर बस्ती, डोंगरीपारा, शिव मंदिर परिसर और रेलवे लाइन किनारे लगे चंदन वृक्षों को भी नहीं छोड़ा है। लगातार हो रही अवैध कटाई के कारण अब यह प्राकृतिक धरोहर समाप्त होने के मुहाने पर खड़ी दिखाई दे रही है।

सुरक्षा पर शुरू नहीं हुआ काम

जानकारी के मुताबिक, करीब 15 वर्ष पहले वन विभाग ने चंदन वन की सुरक्षा के लिए लगभग 10 लाख रुपये की योजना तैयार की थी। इस योजना में तार की बाड़, सोलर लाइट और सुरक्षा व्यवस्था जैसी सुविधाएं शामिल थीं, ताकि चंदन पेड़ों की कटाई और तस्करी पर रोक लगाई जा सके। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि योजना केवल कागजों तक सीमित रह गई और जमीनी स्तर पर कोई काम शुरू नहीं हो पाया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि समय रहते सुरक्षा व्यवस्था लागू कर दी जाती तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। वन विभाग की कथित लापरवाही और निगरानी की कमी के कारण तस्करों का नेटवर्क लगातार सक्रिय बना रहा।

ग्रामीणों ने संभाली जिम्मेदारी

चंदन वन को बचाने के लिए ग्रामीणों ने अपने स्तर पर भी प्रयास किए। गांव के लोगों ने समिति बनाकर निगरानी शुरू की और कई बार तस्करों को पकड़कर पुलिस के हवाले भी किया। बावजूद इसके, स्थायी सुरक्षा व्यवस्था और सख्त कार्रवाई नहीं होने से अवैध कटाई रुक नहीं सकी।ग्रामीणों का कहना है कि तस्कर रात के अंधेरे में पेड़ों को काटकर आसानी से फरार हो जाते हैं। जंगल क्षेत्र में पर्याप्त गश्त और आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने का फायदा लगातार उठाया जा रहा है। ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रशासन से तत्काल ठोस कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जल्द प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ियां केवल कहानियों में ही बस्तर के चंदन वन के बारे में सुन पाएंगी। ग्रामीणों ने चंदन वन क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने, नियमित सुरक्षा गश्त बढ़ाने और तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। फिलहाल पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

ढाई साल में बदले गए भाजपा सरकार के 8 मंत्रियों के ओएसडी

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सरकार की छवि पर पड़ रहा है खराब असर

अब बदली मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की ओएसडी

रायपुर छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के दौरान कई मंत्रियों के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारियों (ओएसडी) और निजी सहायकों (पीए) को उनके पदों से हटाया गया है। प्रशासनिक व्यवस्था में कसावट, खराब तालमेल और अनैतिक कार्यों की शिकायतों के कारण यह कार्रवाई की गई है। कुछ जगहों पर भष्टाचार के मामलों के चलते उन पर गाज गिरी है। मगर इससे सरकार की ही छवि पर खराब असर पड़ने लगा है।

अब तक डिप्टी सीएम अरुण साव के ओएसडी विपुल कुमार गुप्ता को हटाकर उनकी जगह अजय कुमार त्रिपाठी को नया ओएसडी नियुक्त किया गया था। वन मंत्री केदार कश्यप के ओएसडी सुनील तिवारी और जितेंद्र गुप्ता को हटाकर मूल विभाग में वापस भेजा गया था। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन, खाद्य मंत्री दयालदास बघेल, राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा और कृषि मंत्री रामविचार नेताम के निजी स्टाफ को भी प्रशासनिक कारणों से बदला गया है। छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के दो साल के कार्यकाल के दौरान मंत्रियों के निजी स्टाफ में बड़े पैमाने पर फेरबदल देखने को मिला है। पिछले 25 महीनों में करीब 8 मंत्रियों के एक दर्जन से ज्यादा ओएसडी और पीए पदों से हटाए जा चुके हैं। इस सामूहिक रवानगी ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। विपक्ष इस मुद्दे को भ्रष्टाचार और ‘पैसे के बंटवारे के विवाद से जोड़ रहा है। वहीं सत्ता पक्ष इसे केवल प्रशासनिक सुधार और कामकाज की बेहतरी के लिए उठाया गया कदम बता रहा है। सरकार के विभिन्न विभागों में काम कर रहे अधिकारियों और सहायकों को हटाने का सिलसिला लगातार जारी है।

सामंजस्य की कमी और विभागीय सुस्ती बनी हटाने की मुख्य वजह। मंत्री केदार कश्यप के पीए सर्कषण सिंह को संविदा में गलत ढंग से नियुक्त किए जाने के कारण सामान्य प्रशासन विभाग ने इसी माह 5 मई को उनकी छुट्टी कर दी थी। तीन दिन पहले ही महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की ओएसडी रूही टेंभुलकर को हटा दिया गया। वे पंचायत विभाग मेें उपायुक्त पद पर थीं। उन्हें मूल विभााग में वापस भेजा गया है। बताया जा रहा है कि मंत्रियों और उनके ओएसडी के बीच तालमेल ठीक नहीं था। कई मामलों में ओएसडी मंत्रियों के क्षेत्र और विभागीय कामकाज में वैसी सक्रियता नहीं दिखा रहे थे जैसी उनसे उम्मीद की जा रही थी। इसके अलावा भाजपा संगठन को भी कई माध्यमों से इन निजी सहायकों के व्यवहार और कामकाज को लेकर शिकायतें मिल रही थीं। माना जा रहा है कि मंत्रियों के काम को और अधिक पारदर्शी और तेज बनाने के लिए इन चेहरों को बदला गया है ताकि सरकार की छवि पर कोई आंच न आए।स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के ओएसडी संजय मरकाम और अजय कन्नौजे को पद से हटाया गया। उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन के ओएसडी भागवत जायसवाल और पीए प्रवीण पांडेय की छुट्टी की गई। डिप्टी सीएम अरुण साव के ओएसडी विपुल गुप्ता को हटाया गया।राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा के ओएसडी दुर्गेश वर्मा, बी. रघु और पीए दुर्गेश धारे हटाए गए। खाद्य मंत्री दयालदास बघेल के ओएसडी संजय गजघाटे की सेवाएं समाप्त की गईं।कृषि मंत्री रामविचार नेताम के ओएसडी तारकेश्वर देवांगन को हटाया गया। वन मंत्री केदार कश्यप के ओएसडी सुनील तिवारी, जितेंद्र गुप्ता और तीर्थराज अग्रवाल को भी पद छोडऩा पड़ा। और अब महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की ओएसडी रूही टेंभुलकर को हटा दिया गया है।

नीट पेपर लीक, युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं: लक्ष्मण बघेल

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आदिवासी युवा छात्र संगठन ने जताया कड़ा विरोध

जगदलपुर देशभर में आयोजित नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक मामले को लेकर आदिवासी युवा छात्र संगठन (आयसु) ने कड़ा विरोध जताया है। आयसु के संभाग अध्यक्ष लक्ष्मण बघेल ने बयान जारी कर कहा है कि यह सिर्फ एक परीक्षा में गड़बड़ी नहीं, बल्कि देश के लगभग 24 लाख विद्यार्थियों के भविष्य के साथ सीधा अन्याय है।

उन्होंने कहा है कि लाखों छात्र-छात्राएँ दिन-रात मेहनत कर डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं, लेकिन पेपर लीक जैसी घटनाएँ मेहनती विद्यार्थियों का मनोबल तोड़ने का काम करती हैं। यह शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। आयसु संभाग अध्यक्ष लक्ष्मण बघेल ने केंद्र सरकार एवं संबंधित एजेंसियों से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था लागू की जाए। नीट परीक्षा लीक पर आदिवासी युवा छात्र संगठन कड़ा निंदा करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को स्तीफा की माँग करता है।

श्री बघेल ने कहा है कि यदि विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो छात्र संगठन सड़क से सदन तक आंदोलन करने को मजबूर होगा। आयसु ने विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता को जायज़ बताते हुए कहा कि देश का युवा न्याय चाहता है, न कि भ्रष्ट व्यवस्था का शिकार बनना। मेहनत करने वाले छात्रों के सपनों का सौदा बंद किया जाए, शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित किया जाए।

रजही डैम में युवक के डूबने की आशंका, तलाश जारी

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दल्ली राजहरा के पथराटोला के पास स्थित रजही डैम में रविवार को एक युवक के डूबने की खबर सामने आई है। घटना के बाद क्षेत्र में हड़कंप मच गया तथा मौके पर लोगों की भीड़ जुट गई।मिली जानकारी के अनुसार युवक की पहचान अनु कौशल, पिता झुमक लाल कौशल, निवासी मानपुर चौक के रूप में की जा रही है। बताया जा रहा है कि युवक भिलाई में छात्रावास में रहकर पढ़ाई करता था और छुट्टी में अपने घर आया हुआ था।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार युवक रजही डैम के पास गया हुआ था, इसी दौरान उसके पानी में डूबने की आशंका जताई जा रही है। घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस एवं ग्रामीण मौके पर पहुंचे और युवक की तलाश शुरू कर दी गई है।समाचार लिखे जाने तक युवक का पता नहीं चल पाया था। पुलिस एवं स्थानीय गोताखोरों द्वारा खोजबीन जारी है। घटना को लेकर क्षेत्र में चिंता और दहशत का माहौल बना हुआ है।

रेत के खेल में मालामाल हो रहे हैं अधिकारी और रेत माफिया

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विभाग करता है दिखावे की कार्रवाई, टूटा ग्रामीणों का भरोसा

2 टिप्पर और 2 ट्रैक्टर जप्त, अवैध भंडारण पर प्रकरण दर्ज

अर्जुन झा-

जगदलपुर बस्तर जिले की नदियों को छलनी कर रेत के खेल में खनिज विभाग के अधिकारी- कर्मचारी और रेत माफिया मालामाल हो हो रहे हैं।विभाग समय समय पर कार्रवाई जरूर करता है, मगर यह कार्रवाई सिर्फ दिखावे की होती है। रेत के अवैध खनन, परिवहन और भंडारण के मामले पकड़े जाने पर लोग उसका मजाक बनाने लगते हैं।

दरअसल बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड की ग्राम पंचायत बनियागांव व अन्य गांवों के आसपास भास्कली नदी व इंद्रावती नदी से तथा भानपुरी व बस्तर विकासखंडों के नदी नालों से बड़े पैमाने पर रेत का दोहन लंबे समय से होता आया है। बनियागांव में तो रेत के खनन व परिवहन में तो खनिज विभाग के ही अधिकारी की मशीनों और वाहनों के उपयोग के आरोप लगते रहे हैं। क्षेत्र के ग्रामीण लंबे समय से कलेक्टर व एसडीएम से शिकायत करते आए हैं। मगर कभी भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई।. इसलिए लोगों का भरोसा खनिज विभाग पर से उठ गया है। अब फिर कलेक्टर आकाश छिकारा के निर्देशानुसार जिले में अवैध रेत उत्खनन, परिवहन और भंडारण के खिलाफ कार्रवाई खनिज विभाग द्वारा की गई है। 23 मई को खनिज अधिकारी शिखर चेरपा के मार्गदर्शन में खनिज विभाग की टीम ने बस्तर और बडांजी क्षेत्र में औचक निरीक्षण कर अवैध रेत परिवहन पर कार्रवाई की।

जांच के दौरान 2 टिप्पर और 2 ट्रैक्टर को अवैध रूप से रेत परिवहन करते पकड़ा गया। खनिज अमले ने वाहनों सहित रेत को जप्त कर पुलिस थाना बस्तर की अभिरक्षा में रखा है। वहीं ग्राम पालाबहार और बड़े आमाबाल क्षेत्र में अवैध रेत भंडारण का भी एक प्रकरण दर्ज किया गया है। कार्रवाई में जिला खनिज जांच दल के सदस्य सहायक खनिज अधिकारी जागृत गायकवाड़, खनिज निरीक्षक अंकित पुरी, खनिज सिपाही डिकेश्वर खरे और कृष्णा उपस्थित रहे। खनिज विभाग ने बताया कि संबंधित प्रकरणों में नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। कलेक्टर आकाश छिकारा के निर्देशानुसार जिले में खनिज रेत के अवैध उत्खनन, भंडारण और परिवहन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए लगातार जांच और सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। मगर सवाल अब भी कायम है कि चंद रुपए जुर्माने के रूप में अदा करने के बाद रेत माफिया फिर से कमाल दिखाने लग जाते हैं। जाहिर सी बात है खनिज विभाग के संरक्षण में ही रेत माफिया ऐसा दुस्साहस करते हैं।

सोशल मीडिया के जरिए बस्तर की आदिवासी संस्कृति को देश दुनिया तक पहुंचा रहे हैं जोजल गांव के युवा अस्तु नाग

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रहन सहन खानपान की विशिष्टता से अवगत करा रहे हैं दुनिया को

जगदलपुर बस्तर की धरती हमेशा से अपनी अनोखी आदिवासी संस्कृति, खान पान और रीति रिवाजों के लिए जानी जाती रही है। लेकिन बदलते समय के साथ आज की युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक जीवनशैली से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में जगदलपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत पुसपाल जोजल गांव के रहने वाले युवा अस्तु नाग ने अपनी संस्कृति को बचाने और उसे लोगों तक पहुंचाने का एक अनोखा बीड़ा उठाया है।

धुरवा आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अस्तु नाग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम का बेहतरीन इस्तेमाल कर रहे हैं। वे अपने अकाउंट @astu_ghumakkad ( एट द रेट अस्तु घुमक्कड़) के जरिए बस्तर की संस्कृति, पारंपरिक खान पान, रीति रिवाजों और लोक जीवन से जुड़े खूबसूरत वीडियो बनाते हैं। आज इंस्टाग्राम पर उनके 48 हज़ार से अधिक फॉलोअर्स हैं, जो उनके काम को बेहद पसंद कर रहे हैं। अस्तु नाग का यह प्रयास केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अपने वीडियो के जरिये समाज को एक बड़ा संदेश भी दे रहे हैं। आज के समय में जहां युवा वर्ग तेजी से पश्चिमी सभ्यता और फास्ट फूड की ओर आकर्षित हो रहा है, वहीं अस्तु लोगों को बस्तर की पारंपरिक भोजन प्रणाली और जीवनशैली की ओर लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

वे बताते हैं कि हमारे पारंपरिक खान पान की आदतें न केवल हमारी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान हैं, बल्कि सेहत और दीर्घायु के लिहाज से भी बेहद लाभकारी हैं। अस्तु नाग का मानना है कि यदि हम अपनी जड़ों, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भूल गए, तो आने वाले समय में हमारी पहचान भी धीरे धीरे पूरी तरह खो जाएगी। इसलिए वे अपनी कला और सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को जागरूक करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। आज अस्तु नाग बस्तर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के युवाओं के लिए एक बड़े प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। उन्होंने समाज के सामने यह साबित कर दिखाया है कि सोशल मीडिया सिर्फ रील बनाने या मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि अगर दृढ़ संकल्प हो तो इसे अपनी संस्कृति, सभ्यता और धरोहर को जीवित रखने का एक मजबूत माध्यम भी बनाया जा सकता है।

जीवनदायिनी तांदुला नदी को वास्तविक स्वरूप में वापस लाने अतिक्रमण हटाने की बड़ी कार्यवाही शुरू

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जेसीबी से खेतों की मेड़ तोड़कर किया जा रहा नदी के समानांतर समतलीकरण, तांदुला नदी का लौटाया जाएगा पुराना वैभवराजस्व और पुलिस प्रशासन की टीम सुबह 05:30 बजे से कर रही है कार्यवाही, अतिक्रमणकारियों को दिया गया था 24 घंटे का अल्टीमेटम

बालोद, 24 मई 2026 बालोद जिले की जीवनदायिनी तांदुला नदी को उसके वास्तविक और मूल स्वरूप में वापस लाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा एक बड़ी और निर्णायक कार्यवाही शुरू कर दी गई है। जिला मुख्यालय के समीप ग्राम सिवनी और देउरतराई क्षेत्र में तांदुला नदी के तट पर किए गए अवैध कब्जे को हटाने के लिए आज सुबह से ही प्रशासनिक अमला मैदान पर उतर चुका है। तहसीलदार द्वारा सभी 14 अतिक्रमणकारियों को 24 घंटे के भीतर कब्जा हटाने का नोटिस जारी किया गया था।

समय सीमा समाप्त होते ही आज सुबह 05:30 बजे से राजस्व और पुलिस प्रशासन की संयुक्त टीम ने मौके पर पहुंचकर कब्जा हटाने की कार्यवाही शुरू कर दी है। नदी क्षेत्र की लगभग साढ़े सात एकड़ भूमि पर अवैध रूप से बनाए गए खेतों की मेड़ों को मशीनों के माध्यम से तोड़ा जा रहा है। इन अवैध खेतों को नदी के समानांतर समतल करने का कार्य तेजी से जारी है। समतलीकरण के बाद इस पूरे क्षेत्र में जलभराव किया जाएगा, जिससे तांदुला नदी को उसका पुराना वैभव और जल संचय क्षमता वापस मिल सकेगा।उल्लेखनीय है कि कुछ महीने पहले भी इस क्षेत्र में अवैध कब्जा हटाने की मुहिम शुरू की गई थी, लेकिन तब खेतों में ग्रीष्मकालीन धान की फसल लगी होने के कारण मानवीय दृष्टिकोण से इसे रोक दिया गया था। अब चूंकि धान की फसल कट चुकी है, प्रशासन ने बिना वक्त गंवाए पुनः इस कब्जा हटाने की कार्रवाई को अंजाम दिया है। राजस्व विभाग की जांच और ड्रोन सर्वे में पता चला था कि जो तांदुला नदी 220 मीटर चौड़ी थी, वह अवैध कब्जों के कारण कई जगहों पर सिकुड़कर मात्र 80 से 90 मीटर ही रह गई थी।

जांच में यह भी सामने आया है कि अधिकांश अतिक्रमणकारियों के पास अन्य जगहों पर अपनी जमीनें हैं और वे किराना दुकान, सैलून आदि जैसे मुख्य व्यवसाय चलाते हैं। कुछ लोगों द्वारा नदी की जमीन पर अवैध कब्जा कर इसे दूसरों को रेगहा पर देने की बात भी प्रमाणित हुई है। अवैध कब्जा हटाने का यह कड़ा कदम तांदुला नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए बेहद जरूरी हो गया था। जिला प्रशासन का मुख्य संकल्प नदी को उसके पुराने और वास्तविक स्वरूप में वापस लाना है, जो आज सुबह से जारी इस त्वरित और बड़ी कार्यवाही से साकार होता दिख रहा है। इस कार्यवाही के दौरान एसडीएम नूतन कंवर, एसडीओपी बोनिफस एक्का, तहसीलदार आशुतोष शर्मा, नायब तहसीलदार मुकेश गजेंद्र, थाना प्रभारी शिशुपाल सिंह, ट्रैफिक टीआई रविशंकर पाण्डेय, गुण्डरदेही थाना प्रभारी नवीन बोरकर, रक्षित निरीक्षक श्रीमती रेवती वर्मा, जल संसाधन विभाग के उप अभियंता विशाल राठौर सहित राजस्व, पुलिस और जल संसाधन विभाग के कर्मचारी मौजूद थे।

जब मिलता था पत्नी का लाइसेंस

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देना पड़ता था लाइसेंस शुल्क 1 रु., पंजीकरण शुल्क 8 आना और दस्तावेज शुल्क 4 आना

दूसरी पत्नी रखने पर बनवाना पड़ता था अलग से एक और लाइसेंस

अर्जुन झा

जगदलपुर एक दौर था, जब रेडियो और साइकिल खरीदने पर लाइसेंस की जरूरत पड़ती थी, लेकिन क्या आपको मालूम है कि पत्नी के लिए भी लाइसेंस बनवाना पड़ता था और दूसरी पत्नी रखने पर अलग से लाइसेंस की जरूरत होती थी? जी हां ऐसा ही होता था ब्रिटिश हुकूमत में। एक ऐसा ही लाइसेंस हमारे हाथ लगा है, जो अंग्रज सरकार के काले सच को उजागर करता है। अंग्रेजों ने हमारे पूर्वजों पर न सिर्फ जमकर जुल्म ढाये थे, बल्कि तरह तरह के शुल्क लगा कर उनसे जमकर धन की उगाही भी करते रहे।

ब्रिटिश हुकूमत में बने कई कानून आजाद भारत में भी कुछ वर्षों तक बदस्तूर जारी रहे। इनमें रेडियो और साइकल के लाइसेंस और पैदल चलने तक के लिए लाइसेंस की जरूरत पड़ती थी। इनका शुल्क महज 10 और 20 पैसे हुआ करता था, मगर उस दौर में यही लोगों पर बहुत भारी पड़ता था, क्योंकि उस समय इनकम सोर्स बहुत कम थे। अब आपको जो जानकारी दे रहे हैं, उसे सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। अंग्रेज शासन काल में पत्नी लाइसेंस विभाग भी हुआ करता था और इस विभाग का अधिकारी मुख्य निरीक्षक हुआ करता था, जो पत्नी के लिए लाइसेंस जारी करता था। पत्नी वंश वृद्धि, गृहस्थ जीवन और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए रखी जाती थी, एक बार में एक ही पत्नी के लिए लाइसेंस जारी किया जाता था। दूसरी पत्नी रखने के लिए अलग से लाइसेंस लेना पड़ता था। लाइसेंस की अवधि 10 वर्ष की होती थी और इसके बाद लाइसेंस नवीनीकरण कराना पड़ता था। लाइसेंस केवल गृहस्थ पुरुषों को जारी किया जाता था। असत्य जानकारी देने पर लाइसेंस रद्द कर दिया जाता था। ऐसा ही एक दुर्लभ लाइसेंस हमें मिला है, जो चौक बाजार बनारस के अनाज एवं वस्त्र व्यापारी लाला घनश्याम दास पिता सेठ मुरारी लाल के नाम पर जारी हुआ था। 17 फाल्गुन संवत 1959 यानि सन 1902 ईस्वी को जारी हुआ था।

शुल्क और लाइसेंस की शर्तें

लाइसेंस का शुल्क 1 रुपया, पंजीकरण शुल्क आठ आना और दस्तावेज शुल्क चार आना समेत कुल दो रुपए अदा करना पड़ते थे। शर्तों के अनुसार एक समय में केवल एक पत्नी रखना विधि सम्मत माना जाता था। पत्नी के साथ सदव्यवहार करना, उसकी सुरक्षा, भरण पोषण, वस्त्र, आवास का इंतजाम करना लाइसेंसी की जिम्मेदारी होती थी। पत्नी को कष्ट देना, त्यागना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता था।. दूसरी पत्नी के लिए अलग से लाइसेंस बनवाना जरूरी था।

बाबा” तो दिल्ली के लायक हैं, युवा सम्हाल लेंगे छत्तीसगढ़ को

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सिंहदेव के सियासी बोल पर पीसीसी चीफ की सम्मानजनक सलाह

अर्जुन झा

जगदलपुर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कांग्रेस नेता टीएस सिंहदेव बाबा के सियासी बोल ने फिर छग कांग्रेस की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने सधे अंदाज में कहा है कि बाबा तो बड़े अनुभवी और सम्माननीय नेता हैं। समय समय पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें बड़ी बड़ी जिम्मेदारियां दी हैं, जिन्हे बाबा ने पूरी गंभीरता के साथ और सफलता पूर्वक निभाया है। वे पूर्णतः परिपक्व नेता हैं, उन्हें अब दिल्ली की जिम्मेदारी सम्हालनी चाहिए।

दरअसल वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव बाबा अक्सर अपने बयानों से कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचाने का काम करते आए हैं। जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, तब बाबा जी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की नाक में दम किए हुए थे। उनकी कुर्सी की भूख इस कदर बढ़ गई थी कि वे अपनी ही सरकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ लगातार बयानबाजी करते रहे।उनके हालिया बयान के आधार पर पीसीसी चीफ दीपक बैज ने उन्हें मार्गदर्शक बन कर दिल्ली की राजनीति करने की सलाह क्या दी कि बाबा के तेवर और सख्त हो गए। उन्होंने अपनी तुलना दीपक बैज से कर डाली कि हम भी हारे वो भी हारे फिर फर्क कैसा? दरअसल दकियानूसी सोच के कुछ कांग्रेस नेता जब जब सत्ता करीब आती दिखती है तब तब वे उसे बयानों और जुमलों के दम पर खुद को आगे करने का प्रयास शुरू कर देते हैं। वे भूल जाते है कि जनता उसे ही पसंद करती है जो लगातार उससे संपर्क में रहती है।

सत्तर साल से भी ज्यादा उम्र के कांग्रेस नेता बाबा सत्ता के दिनों में रणछोड़ दास की उपाधि से नवाजे गए थे। अब उन्हें अचानक प्रदेश और पार्टी की चिंता सताने लगी है। ये वहीं बाबा हैं, जिन्होंने पूरे पांच साल तक ढाई आखर प्रेम की भाषा कभी नहीं बोली और पूरे पांच साल तक बीजेपी की बिसात पर ढाई ढाई घर चल कर भूपेश सरकार को परेशान करते रहे। इससे पूरे प्रदेश में यह संदेश गया कि इनसे तो अपना परिवार ही नहीं संभलता है तो ये प्रदेश क्या संभालेंगे? सत्ता से बाहर होते ही कांग्रेस को नए कलेवर में पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज द्वारा अपने युवा साथियों के साथ संवारा गया, लगातार पदयात्राएं करके दीपक बैज ने बीजेपी और उसकी सरकार की खामियों को जनता के सामने लाया। आदिवासी समाज को कांग्रेस के पक्ष में एकजुट करने और धर्म की राजनीति करने वालों के खिलाफ संघर्ष किया, लेकिन ये बुजुर्ग मासूम बन कर अपने शौक कभी इंग्लैंड तो कभी ऑस्ट्रेलिया में पूरे करते रहे। भारी बारिश, गर्मी में जब कार्यकर्ता सड़क पर आंदोलन करते रहे तो बाबा साहब अपना व्यापार सम्हालते रहे। छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनाव को महज ढाई साल बचे हैं और पूरे प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में शीतल बयार बहने लगी है तब बाबा को देश, प्रदेश, कांग्रेस और कार्यकर्ताओं की चिंता सताने लगी है।

यह चिंता उनके अकेले की नहीं है, बल्कि उन तमाम सत्ता लोभियों की है जिनके बाबा हमेशा लंबरदार बनकर काम करते आए हैं।आज शायद उन्हीं नेताओं के इशारे पर वे पुनः सक्रिय होकर सुचारू रूप से संघर्ष कर अपने युवा कार्यकर्ताओं व नेताओं के मार्गदर्शक बन कर संगठन को लगातार मजबूत बनाने का काम कर रहे पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज को एक हारे हुए नेता बता रहे हैं। मासूमियत की चादर ओढ़े बाबा जी कब तक राजमहल की राजनीति करेंगे, सत्ता पाने और जनसेवा हेतु जनयात्रा करके जनता का सुख दुख जानना ही होता है। तभी जनता उन्हें अपना सरताज बनाती है। रायपुर में जब कुछ पत्रकारों ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज से बाबा की टिप्पणी पर सवाल किया तो उनका निहायत ही सधा हुआ और बाबा के प्रति सम्मानजनक जवाब आया। श्री बैज ने कहा- बाबा हम सबके आदरणीय हैं, अनुभवी नेता हैं, पार्टी नेतृत्व ने उन्हें तमिलनाडु और पांडुचेरी का ऑब्जर्वर नियुक्त किया था। दोनों राज्यों में उन्होंने अच्छा काम किया। उन्हें अब दिल्ली की राजनीति करनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क पर “मक्का- जाम

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सड़क पर सुखाया जा रहा है मक्का, आवागमन हुआ अवरुद्ध

किलोमीटर तक सड़क जाम जनप्रतिनिधि मौन

बकावंड बस्तर जिले के विकासखंड बकावंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सतोषा में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़क इन दिनों ग्रामीणों की सुविधा के बजाय “मक्का सुखाने के मैदान” में तब्दील हो गई है। सतोषा, चिकलपदर, गोटीगुड़ा और आसपास के कुछ बड़े किसानों द्वारा लगभग एक किलोमीटर तक सड़क पर मक्का फैलाकर मार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया गया है।सड़क के दोनों किनारों पर लकड़ी और बांस लगाकर अस्थायी घेराबंदी कर दी गई है, जिससे आम लोगों, बाइक चालकों और चार पहिया वाहनों को आने जाने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर सड़क पूरी तरह मक्का से ढकी दिखाई दे रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का उद्देश्य गांवों को बेहतर सड़क सुविधा देकर आवागमन आसान बनाना था, लेकिन यहां सड़क को निजी उपयोग में लेकर खुलेआम कब्जा कर लिया गया है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी लंबी दूरी तक सड़क घेरकर मक्का सुखाने की अनुमति किसने दी? स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि यही काम कोई गरीब या सामान्य ग्रामीण करता तो प्रशासन तत्काल कार्रवाई कर देता, लेकिन प्रभावशाली किसानों के मामले मे अधिकारी और जनप्रतिनिधि चुप्पी साधे हुए हैं। इससे जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।ग्रामीणों ने इसे सड़क सुरक्षा के साथ सीधा खिलवाड़ बताया है।

उनका कहना है कि रात के समय सड़क पर फैले मक्का और लगाए गए अस्थायी अवरोध किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकते हैं। लगातार दुर्घटना की आशंका बनी हुई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़क को निजी खेत और खलिहान की तरह इस्तेमाल करने वालों पर प्रशासन सख्त कार्रवाई करेगा, या फिर नियम केवल आम लोगों तक ही सीमित रहेंगे? ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से तत्काल जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करने और सड़क को जल्द खाली कराने की मांग की है।

वर्सन:दिए हैं कार्रवाई के निर्देश

मामले की जानकारी मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों को सड़क खाली कराने और जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। करपावंड थाना प्रभारी को भी कार्रवाई के लिए कहा है।

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