कोसा उत्पादन से मुंह मोड़ा आदिवासियों ने
टसर उत्पादन छोड़ पलायन कर रहे लोग
अर्जुन झा
जगदलपुर बस्तर के रैली कोसा पर पलायन की बड़ी मार पड़ी है। इसके संग्रहण में लगे आदिवासियों ने इस काम से मुंह मोड़ लिया है। वे ज्यादा कमाई की आस में दूसरे प्रदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसका सीधा असर टसर उत्पादन पर पड़ा है। टसर उत्पादन में 45 फीसदी तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
बस्तर का नैसर्गिक रैली कोसा अपने मजबूत और लंबे धागे के लिए प्रसिद्ध है। रैली कोसा का विश्व में एकमात्र उत्पादन स्थल बस्तर के घने जंगल हैं। यहां रैली कोसा का उत्पादन तो बहुतायत में हो रहा है, मगर इसके संग्रहण में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चला है कि कोरोना महामारी के बाद वर्ष 2019-2021 से इसका संग्रहण लगातार गिरता जा रहा है। इस बारे में कालीपुर स्थित क्षेत्रीय रेशम अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक और तकनीशियनों ने इसका सबसे प्रमुख कारण आदिवासी संग्राहकों का टसर संग्रहण से मुंह मोड़ना बताया है। इनके अध्ययन और शोध से पता चला है कि टसर संग्राहक अब रोजी रोटी की तलाश में अन्य राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। अब बहुत कम लोग लोग ही जंगल में रैली कोसा टसर का संग्रहण कर रहे हैं।वहीं नई पीढ़ी शिक्षित होने के बाद वनोपज संग्रहण से भी दूर हो रही है। यह भी टसर संग्रहण में आई गिरावट का बड़ा कारण है।
जुड़े बस्तर विवि के शोधार्थी
बीते वर्ष बस्तर विश्वविद्यालय और क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र के बीच एक एमओयू हुआ था। इस एमओयू के अनुसार बस्तर विश्वविद्यालय के छात्रों को रेशम केंद्र में शोध का अवसर मिला है। इस सत्र में विवि की प्रीति जोशी, श्रद्धा सिंह, ललिता नेताम, भूमिका तांडिया, नीलेश कुमार सिन्हा और चंद्रशेखर केंद्र में अपने अपने टॉपिक पर शोध कर रहे हैं। इन्हें केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. अरविंद कुमार एस, वरिष्ठ तकनीकी सहायक सुनील कुमार परीक्षा, बी बी कांजीलाल और अन्य जरूरी अध्ययन सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं।वैज्ञानिक अरविंद कुमार ने बताया कि अभी केंद्र मेरा रेशम मेरा अभियान पर ध्यान केंद्रित कर विभिन्न गांवों में रेशम उत्पादन और अनुसंधान को प्रोत्साहित करने जुटा हुआ है।



