बड़े पराली में भी धर्मांतरण पर लगी पूर्णतः रोक
पास्टर, पादरियों के प्रवेश और धर्मांतरण गतिविधियों पर लगा पूर्णतः प्रतिबंध
घर वापसी अभियान भी चल रहा है लगातार
अर्जुन झा
जगदलपुर नक्सलमुक्त बस्तर अब आधुनिक युग की सुख सुविधाओं से संपन्न होने के साथ ही अपनी प्राचीन समृद्ध संस्कृति और परंपराओं की ओर तेजी से लौट रहा है। नक्सलवाद का जख्म झेलने के बाद धर्मांतरण के जख्म को भरने में यहां के आदिवासी कमर कस चुके हैं। यही वजह है कि पूरे संभाग में नीला बोर्ड धर्मांतरण गतिविधियों में लिप्त लोगों के लिए बड़ा खतरा साबित हो रहा है। संभाग में धर्मांतरण के खिलाफ बड़े ही जोरदार ढंग से आवाज उठाई जाने लगी है। गांव गांव में लगे नीले बोर्ड इस बात की तस्दीक कर रहे हैं।

बस्तर संभाग में बड़े पैमाने पर आदिवासियों और अन्य समुदायों के लोगों का धर्मांतरण हुआ है। गांवों में आदिवासियों के आस्था के केंद्र मातागुड़ी और देवगुड़ी की अपेक्षा चर्चों की की संख्या बेतहाशा बढ़ गई है। जिन गांवों में चर्च नहीं है, वहां किसी मतांतारित व्यक्ति की झोपड़ी या मकान में हर सप्ताह प्रार्थना सभा का आयोजब होता है। वहीं गांवों में चंगाई सभाओं का आयोजन कर लोगों की मानसिक एवं शारीरिक बीमारियां दूर करने का दावा किया जाता है। कम पढ़े लिखे भोले भाले आदिवासी भ्रम जाल में फंसकर अपने समृद्ध विरासत को त्याग देते हैं और धर्म परिवर्तन कर लेते हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि जो अंग्रेज भारत को सपेरों, बाजीगरों जाहिलों और अंधविश्वास से भरे लोगों का देश बताकर हमारा मजाक उड़ाते रहे हैं, उन्हीं अंग्रेजों धर्म के लोग आज यहां अंधविश्वास फैला कर धर्मांतरण कराने में लगे हुए हैं।
आदिम संस्कृति और धर्म पर हो रहे बाहरी धर्म के हमले ने आज की शिक्षित आदिवासी पीढ़ी को उद्वेलित करके रख दिया है। छत्तीसगढ़ की जिस आदिम संस्कृति की पूरी दुनिया में अलग पहचान रही है, उस आदिवासी पहचान को बचाए रखने के लिए समाज ने कमर कस ली है। बस्तर के गांव गांव में बैठकें कर पास्टर, पादरियों और ईसाई धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर रोक लगाई जा रही है। प्रवेश पर प्रतिबंध से संबंधित बोर्ड अब प्रायः हर गांव में नजर आने लगा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ये सारे बोर्ड नीले रंग के पेंट से पुते हुए हैं और उन पर सफेद रंग के पेंट से प्रवेश पर प्रतिबंध संबंधी वाक्य अंकित रहते हैं। बस्तर संविधान की पांचवी अनुसूची क्षेत्र अंतर्गत आता है। यहां पेसा अधिनियम लागू है। इसके तहत यहां के आदिवासियों को आदिम संस्कृति, पूजा पद्धति, रूढ़िवादी परंपराओं, जल जंगल और जमीन के संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। इसी अधिकार का हवाला देते हुए यहां के आदिवासियों ने धर्मांतरण के खिलाफ जोरदार ढंग से आवाज बुलंद कर रखी है। बस्तर संभाग के कांकेर जिले की दुर्गूकोंदल तहसील की ग्राम पंचायत मंगहुर के ग्राम बड़े पराली में भी धर्मांतरण के खिलाफ ग्रामीण और आदिवासी एकजुट हो गए हैं। यहां भी पास्टर, पादरियों और धर्म प्रचार की आड़ में धर्मांतरण कराने वाले लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। ग्राम इरागांव का धर्मांतरित आदिवासी युवक अरुण कुमार हिड़को पिता सिरदर हिड़को ईसाई धर्म छोड़ कर अपने मूल धर्म में वापस लौट आया है। गांव वालों ने उसकी आरती उतार कर स्वागत किया और उसे अपने ग्राम समाज में शामिल कर लिया।
अंतिम संस्कार पर जगह जगह विवाद
वर्षों पहले धर्मांतरित हो चुके परिवारों के सदस्यों की मृत्यु होने पर उनके अंतिम संस्कार को लेकर बस्तर के सैकड़ों गांवों में विवाद की स्थिति निर्मित हो चुकी है। ऐसे हालात अब भी बनते रहते हैं। दरअसल मातांतरित परिवार गांव की जमीन पर ही अपने मृत परिजन को दफनाने की जिद पर अड़ जाते हैं। वहीं आम ग्रामीण अपनी परंपरा का हवाला देते हुए इसका विरोध करते हैं। चर्चा है कि कई गांवों में वन विभाग की जमीन पर कब्जा कर कब्रिस्तान बना लिए गए हैं। गांवों की जमीन में शव दफनाने के पीछे यही मंशा निहित होती है।




