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न रहेगा बांस, न बजेगी बंसी के फेर में बजा कांग्रेस का बैंड

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  •  सीएम की रेस से हटाने के लिए साजिश के तहत हरवाए गए बैज और सिंहदेव
  • आदिवासी मुख्यमंत्री का भाजपाई दांव कांग्रेस को पड़ जाएगा बहुत भारी

अर्जुन झा

जगदलपुर राजनीति से जुड़े लोग किसी के सगे नहीं होते। ये कब दगाबाजी कर दें और अपनी औकात दिखा दें, कहा नहीं जा सकता। कुछ ऐसा ही इस बार के चुनाव में कांग्रेस की राजनीति में हुआ है। मुख्यमंत्री की रेस से हटाने के लिए दिग्गज नेता टीएस सिंहदेव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की राजनीतिक हत्या करा दी गई। न रहेगा बांस, न बजेगी बंसी के चक्कर में कांग्रेस का ही बैंड बजवा दिया गया। टीएस सिंहदेव पहले से ही मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे हैं। वहीं आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग उठने की स्थिति में दीपक बैज सबसे बड़ा चेहरा थे। ये दोनों नेता चुनाव जीतने न पाएं, इसके लिए पूरी ताकत कांग्रेस की ही एक लॉबी ने लगा दी थी।

कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पार्टी के नेता दिनरात एक दूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं। वे कतई नहीं चाहते कि उनके सिवा कोई दूसरा नेता राजनीति में आगे बढ़ पाए। इसके लिए कांग्रेस के कुछ नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। भितरघात की जब भी बात आती है, तो हर किसी की जहन में कांग्रेस शब्द गूंज उठता है। भितरघात से भाजपा भी अछूती नहीं है, मगर उसके नेता पार्टी को पहले प्राथमिकता देते हैं। कांग्रेस में तो व्यक्ति की पूजा होती है। 2018 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद से कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर घमासान शुरू हो गया था। तब टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। सिंहदेव ने काफी जोर लगाया, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बना दिया। उस समय टीएस सिंहदेव को यह कहकर शांत बिठा दिया गया था कि भूपेश बघेल ढाई साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्हालेंगे और बाकी के ढाई साल आप। मगर जब साढ़े तीन साल गुजर जाने के बाद भी सिंहदेव को मुख्यमंत्री पद नहीं मिला, तो उन्होंने कोहराम मचाना शुरु कर दिया। टीएस सिंहदेव बाबा के तेवर ने कांग्रेस के दिल्ली दरबार को भी हिला डाला था। फिर चला चली की बेला में बाबा को उप मुख्यमंत्री बनाकर लॉलीपॉप थमा दिया गया। बाबा ढंग से सत्ता सुख भोग भी नहीं पाए थे कि चुनाव की बेला आ गई। जाहिर सी बात है कि इस विधानसभा चुनाव में अगर कांग्रेस की सरकार बनती, तो टीएस बाबा मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार होते। वहीं जब आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग उठती तो दीपक बैज ही सबसे बड़े विकल्प होते। मुख्यमंत्री पद के लिए संभावित ये चेहरे राज्य के कुछ बड़े नेताओं को खटकने लगे थे। बाबा और बैज को उक्त नेता अपनी राह का कांटा मानने लगे थे। राह के कांटों को हटाने के लिए उक्त नेताओं ने चुनाव के दौरान ऐसी चाल चली और खेल किया कि टीएस सिंहदेव बाबा एवं दीपक बैज को पराजय का सामना करना पड़ा। इस तरह न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी के चक्कर में पूरे छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का ही बैंड बज गया। पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस को आधी ही सीटें मिल पाई

कांग्रेस का ये है आदिवासी प्रेम !

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज आदिवासी समुदाय से आते हैं। वे अभा कांग्रेस कमेटी के आदिवासी विभाग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं। वे बस्तर जिले के चित्रकोट विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक चुने गए थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें बस्तर सीट से उतार दिया। दीपक बैज यह चुनाव भी प्रचंड मतों के साथ जीत गए। दीपक बैज संसद में सर्वाधिक मुखर होकर आवाज उठाने वाले छत्तीसगढ़ के इकलौते सांसद हैं। इसके अलावा उन्होंने आदिवासी समुदाय तथा बस्तर के विकास के लिए कड़ी मेहनत भी की है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय का मुख्य चेहरा बनकर उभरे हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में दीपक बैज को कांग्रेस ने पुनः चित्रकोट सीट से उतारा था। चित्रकोट में उनके पक्ष में जबरदस्त लहर भी देखी जा रही थी, लेकिन कांग्रेस के ही प्रतिद्वंदी खेमे के नेताओं ने श्री बैज को सीएम की रेस से हटाने के लिए उन्हें हराने का षड्यंत्र रच डाला। इस साजिश की परतें अब खुलने लगी हैं। बैज को हराने की सुपारी एक मंत्री को दी गई थी। मंत्री ने अपने नजदीकी लोगों माध्यम से ऐसा खेल खेला कि श्री बैज को हार का सामना करना पड़ा। एक आदिवासी नेता को निपटाने के लिए राज्य के ही कुछ बड़े कांग्रेस नेताओं ने जो साजिश रची, उसने कांग्रेस के तथाकथित आदिवासी प्रेम की असलियत सामने ला दी है।

भाजपा ने चला आदिवासी दांव तो..?

छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनने जा रही है। अगर भारतीय जनता पार्टी अपने किसी आदिवासी विधायक को इस आदिवासी बहुल राज्य को मुख्यमंत्री बना देती है, तो फिर छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय के लोग कांग्रेस से पूरी तरह छिटक जाएंगे। तब हालात कांग्रेस के खिलाफ बनते चले जाएंगे और 2024 के लोकसभा चुनाव और 2028 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जो दुर्गति होगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आदिवासी, दलित, ओबीसी, अनुसूचित जाति व अल्पसंख्यक कार्ड खेलती आ रही कांग्रेस को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। वहीं भाजपा छत्तीसगढ़ में इस कदर मजबूत हो जाएगी कि उसे चुनौती दे पाना भी कांग्रेस के लिए मुश्किल हो जाएगा।

तेलंगाना सीएम रेड्डी को बधाई दी दीपक बैज ने

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जगदलपुर बस्तर लोकसभा क्षेत्र के सांसद एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने आज अपने साथी सांसद, तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं तेलंगाना के नव निर्वाचित मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से लोकसभा में मुलाकात की। इस दौरान दीपक बैज ने तेलंगाना में सरकार बनाने एवं मुख्यमंत्री बनने पर रेवंत रेड्डी को बधाई एवं शुभकामनाएं दी। बैज ने छ्ग प्रदेश कांग्रेस एवं निवर्तमान भूपेश बघेल सरकार द्वारा जनहित में किए गए कार्यों और योजनाओं की जानकारी देते हुए  रेड्डी से अपेक्षा की कि वैसी ही योजनाएं भी तेलंगाना में भी लागू करेंगे।

नगरनार प्लांट से आयरन ले जाते एक ही नंबर के दो ट्रक जप्त

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  • सीआईएसएफ ने पकड़ा मामला, पुलिस जांच जारी
  • दोनों ट्रक ड्राईवर रहस्यमय ढंग से हो गए फरार

नगरनार नगरनार स्टील प्लांट से पिग आयरन भरकर निकल रहे एक ही नंबर के दो ट्रकों को सीआईएसएफ के जवानों ने पकड़ लिया और नगरनार पुलिस के हवाले किया। दोनों के वाहन चालक फरार हो गए हैं। हजारों टन लोहा चोरी का खेल वाहन की नंबर प्लेट बदलकर किए जाने का मामला प्रकाश में आया है। नगरनार पुलिस मामले की पड़ताल कर रही है। पकड़ा गया ट्रक सीजी 04 एमके 9383 किसके नाम पर दर्ज है और कहां के लिए प्लांट से लोहे की लोडिंग कराई गई थी। इसका खुलासा होना बाकी है। पुलिस के सक्रियता से लोहा चोरों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। प्लांट में उत्पादन शुरू होने के पहले भी लोहा चोरी के मामले का नगरनार पुलिस पर्दाफाश कर चुकी है। मिली जानकारी के अनुसार चामुंडा ट्रांसपोर्ट द्वारा नगरनार स्टील प्लांट से पिग आयरन लोडिंग को लेकर दो ट्रक बुक कराए गए थे । सीजी 04 एमके 9383 नंबर के तथा 14 चक्कों वाले दो ट्रक पिग आयरन लोड कर प्लांट से निकलने की तैयारी में थे। इसकी भनक प्लांट के कर्मचारियों और सुरक्षा में लगे सीआईएसएफ के जवानों को लग गई और दोनों ट्रकों को प्लांट के अंदर ही पकड़ लिया गया। इन ट्रकों को नगरनार थाने के सुपुर्द कर दिया गया है। पिग आयरन दरअसल लोहा, कार्बन, सिलिकान, मैग्नीज, फॉस्फोरस और गंधक की मिश्र धातु है। यह एक माध्यमिक उत्पाद है, जिसका प्रसंस्करण कर अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं। अन्य चीज बनाने के लिए यह एक कच्चा माल है। पिग आयरन एक उच्च कार्बन इंधन और कोक जैसे रिडक्टेंट का उत्पाद है जिसमें आमतौर पर फ्लक्स के रूप में चूना पत्थर होता है। पिग आयरन का उत्पादन ब्लास्ट फर्नेंस में लोहे को गलाने या इलेक्ट्रिक भट्टियों में इलमेनाइट को गलाने में किया जाता है। पिग आयरन को आम बोलचाल की भाषा में कच्चा लोहा भी कहा जाता है। प्लांट के अंदर एक ही नंबर के दो वाहन प्रवेश करने में कैसे सफल हो गए, यह आश्चर्य का विषय है। नगरनार प्लांट की सुरक्षा सीआईएसएफ के हवाले है। वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन एक ही नंबर के दो वाहन प्लांट में कैसे प्रवेश किया था फिर प्लांट में प्रवेश करने के बाद नंबर प्लेट बदल दी गई, अगर ऐसा हुआ, तो किसके इशारे पर? ये जांच के विषय हैं। वह सरगना जो सुरक्षा घेरे में भी सेंधमारी कर पिग आयरन पार करने का प्रयास कर रहा था या इसके पूर्व भी यह खेल खेला जा चुका है। इसकी भी जांच होनी चाहिए।

वाहन चालक फरार

दोनों ट्रकों को सुरक्षा जवानों ने जब्त किया तो इनके कब्जे से वाहन चालक फरार कैसे हो गए? यह सवाल सीआईएसएफ के उन जवानों पर शक पैदा करता है, जिन्होंने ट्रकों को पकड़ा है। कहा जा रहा है कि ट्रक ड्राइवरों को फरार होने में मदद की गई है। वाहन चालक का नाम खान बताया जा रहा है। समाचार लिखे जाने तक प्रबंधन का कोई जिम्मेदार व्यक्ति इस मामले में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है।

तीसरी आंख खोलेगी कई राज

नगरनार स्टील प्लांट के चारों ओर सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। इन कैमरों के जरिए प्लांट के अंदर एवं बाहर आने जाने वाले वाहनों तथा व्यक्तियों पर नजर रखी जाती है। कच्चा लोहा चोरी के इस मामले में सीसीटीवी फुटेज से कई राज खुल सकते हैं। बशर्ते सही ढंग से पड़ताल की जाए। इसके पूर्व भी प्लांट से लोहा चोरी का मामला उजागर हुआ था। उक्त मामले में निष्पक्ष व विस्तृत रूप से जांच न होने के कारण कई राज वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में ही दब के रह गए थे।

नगरनार प्लांट से आयरन ले जाते एक ही नंबर के दो ट्रक जप्त*वर्सन

चल रही है जांच

प्लांट के कर्मचारियों की शिकायत पर नगरनार थाने में मामला पंजीबद्ध किया गया है। पिग आयरन लदे एक ही नंबर वाले दोनों ट्रकों को पुलिस ने जब्त कर लिया है। फरार वाहन चालक की तलाश और मामले की जांच की जा रही है।

विकास कुमार’ नगर पुलिस अधीक्षक

धान खरीदी में कोताही सस्पेंड किए दो समिति प्रबंध

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  • मूली और सोनारपाल के समिति प्रबंधकों पर गाज
  • बस्तर व बकावंड अनुभाग के धान खरीदी केंद्रों का कलेक्टर ने किया निरीक्षण

बकावंड धान खरीदी की व्यवस्था में कोताही बरतना दो समिति प्रबंधकों को भारी पड़ गया। बारदाना का प्रबंध न करने के कारण मूली और सोनारपाल उपार्जन केंद्रों के प्रबंधको को हटाने के निर्देश कलेक्टर ने दिए हैं। धान खरीदी केंद्रों के निरीक्षण के दौरान बस्तर के कलेक्टर विजय दयाराम के. ने खामियां पाई थी।

जिले में धान उपार्जन केंद्रों के माध्यम से कृषकों से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की स्थिति का जायजा लेने के लिए शुक्रवार को कलेक्टर विजय दयाराम के. ने बस्तर अनुभाग के सरगीपाल, राजनगर, मूली, मंगनार, सोनारपाल और देवड़ा धान उपार्जन केंद्रों का निरीक्षण किया। कलेक्टर ने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष सतर्कता के साथ नियमानुसार खरीदी करना सुनिश्चित करें। धान खरीदी में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लापरवाही करने वाले लैंपस प्रबंधकों और खरीदी प्रभारी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाएगी। कलेक्टर ने बारदाना की उचित व्यवस्था नहीं करने के कारण मूली, सोनारपाल उपार्जन केंद्र के समिति प्रबंधकों को निलंबित करने के निर्देश दिए। साथ ही मूली, सोनारपाल और देवड़ा उपार्जन केंद्रों के खरीदी प्रभारी और बारदाना प्रभारी को हटाने के निर्देश दिए। उन्होंने लैंपस प्रबंधकों को नियमानुसार खरीदी करने और छोटे व सीमांत किसानों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए। दो दिन से हो रही बारिश की वजह से उपार्जन केंद्रों में नमी वाले स्थलों का मुरम एवं डस्ट से समतलीकरण कर खरीदी कार्य को सुचारू रूप से संचालित करने के निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने खरीदी केंद्र में धान बेचने पहुंचे किसानों से उनके जमीन के आधार पर फसल उत्पादन की स्थिति का भी संज्ञान लिया। केंद्र में कलेक्टर ने धान की नमी मापक से धान की नमी की गुणवत्ता का भी आंकलन किया। उन्होंने नमी के तय मानक के अनुसार ही धान की खरीदी सुनिश्चित करने कहा। खरीदी केंद्र में बारदाने की उपलब्धता, पुराने बरदाने की स्थित और भंडारण, बायोमेट्रिक मशीन का उपयोग, किसानों की आधार लिंकिंग, किसान द्वारा किए नॉमिनेशन की स्थिति, व्यवस्थित स्टेकिंग कार्य, टोकन आधार पर खरीदी, बफर लिमिट की स्थिति का भी उन्होंने निरीक्षण किया। कलेक्टर ने खरीदी केंद्रों से डीओ कटवाकर जल्द उठाव करवाने के लिए निर्देश दिए। खरीदी केंद्र में आवश्यक व्यवस्थाओं को भी दुरुस्त करने के निर्देश अधिकारियों और नोडल को दिए।

केंद्रों से होने लगा धान का उठाव

कलेक्टर विजय के निर्देश के अनुसार धान उपार्जन केंद्रों से डीओ कटवाकर मिलरों द्वारा केंद्र से धान का उठाव प्रारंभ कर दिया गया है। पल्ली, जगदलपुर, रेटावंड, मुंडागांव, बाबूसेमरा, बालेंगा उपार्जन केंद्रों से शुक्रवार को धान का उठाव किया गया। साथ ही कई उपार्जन केंद्रों का डीओ काटा गया है, जहां से धान का उठाव शनिवार को किया जाएगा। कलेक्टर विजय दयाराम के. ने सोनारपाल में रेशम धागाकरण इकाई और निर्माणाधीन दुग्ध प्रसंस्करण केंद्र का भी निरीक्षण किया। इस दौरान बस्तर के एसडीएम ओमप्रकाश वर्मा तथा अन्य अधिकारी भी मौजूद थे।

राजहरा व्यापारी संघ चुनाव कार्यक्रम निम्न प्रकार रहेंगे

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1. दिनांक 9/12/23 एवं 10/12/23 दिन शनिवार एवं रविवार को प्रत्याशी आवेदन पत्र एवं मतदाता सूची वितरण प्रातः 10:00 बजे से 1:00 बजे तक एवं संध्या 3:00 से 5:00 बजे तक राजहरा व्यापारी संघ चुनाव कार्यालय शर्मा पेट्रोल पंप प्रांगण से किया जाएगा l

2. प्रत्याशी आवेदन पत्र दिनांक 11 दिसंबर एवं 12 दिसंबर दिन सोमवार एवं मंगलवार सुबह 10:00 बजे से 1:00 बजे एवं 3:00 बजे से 5:00 बजे तक जमा कर सकेंगे l

3. दिनांक 14/12/2023 दिन गुरुवार को संध्या 5:00 बजे तक नाम वापसी आवेदन प्रस्तुत किए जाएंगे जिस हेतु प्रत्याशी को स्वयं उपस्थित होना होगा l

4. चुनाव प्रत्याशी हेतु आवेदन पत्र जमा करने के लिए प्रत्याशी को स्वयं उपस्थित होकर आवेदन पत्र जमा करना होगा l

5. दिनांक 16/12/2023 को प्रातः 10:00 बजे प्रत्याशियों की अंतिम सूची का प्रकाशन सूचना पट कार्यालय शर्मा पेट्रोल पंप में किया जावेगा l

6. दिनांक 19/12/2023 को चुनाव प्रातः 9:00 बजे से संध्या 4:00 बजे तक गुरुद्वारा हाल में संपन्न होगा l

नोट : व्यापारी बंधु अपना मतदाता परिचय पत्र राजा फ्लावर बस स्टैंड से प्राप्त 10:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक प्राप्त कर सकते हैं l

मप्र में पिछड़ा वर्ग को ताज, आदिवासी होगा छ्ग का सरताज

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  • राजस्थान में राजघराने से, मप्र में ओबीसी और छग में आदिवासी मुख्यमंत्री संभव
  • विष्णुदेव, रेणुका, केदार कश्यप, लता उसेंडी, विक्रम उसेंडी पर टिकी निगाहें

अर्जुन झा

जगदलपुर कांग्रेस, जद यू, राजद समेत प्रायः सभी विपक्षी दल जहां जातिगत जनगणना में ही उलझे हुए हैं, वहीं भाजपा छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में आदिवासी एवं ओबीसी कार्ड खेलकर जातिवादी राजनीति पर घड़ों पानी उंडेलने की तैयारी कर चुकी है।

हालिया संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने तीन राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में जबरदस्त जीत हासिल की है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली है, जबकि मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार की पुनरावृति हुई है। कांग्रेस ने तेलंगाना का किला फतह किया है। तेलंगाना में मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कांग्रेस ने बिना विलंब किए कर दी। वहां सरकार का गठन भी हो चुका है। शेष तीनों भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लेकर भाजपा में उहापोह की स्थिति निर्मित हो गई है। विपक्षी दलों के नेता इसे लेकर भाजपा पर तंज कसने से नहीं चूक रहे हैं। कांग्रेस, जदयू और राजद जातिगत जनगणना कराकर जिसकी जितनी आबादी, उस जाति को उतना अधिकार देने का दम भर रहे हैं। भाजपा इससे जुदा रहकर एक ऐसा कदम छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में उठाने जा रही है, जो कांग्रेस के सपने पर पानी फेर सकता है। भाजपा जहां मध्यप्रदेश में ओबीसी कार्ड और छत्तीसगढ़ में आदिवासी कार्ड खेलने वाली है।

इनमें से हो सकता है मुख्यमंत्री

नई दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में मौजूद एक भरोसेमंद सूत्र के मुताबिक राजस्थान का राजकाज भाजपा वहां के राजघराने के हाथों में सौंपने जा रही है। राजघराने से मतलब यह कि महारानी वसुंधरा या राजकुमारी दीया कुमारी में से ही किसी को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। वहीं मध्यप्रदेश में पिछड़ा वर्ग से किसी विधायक को मुख्यमंत्री का ताज मिल सकता है। इधर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहां आदिवासियों की बहुलता के लिहाज से छत्तीसगढ़ का सरताज कोई आदिवासी विधायक ही बनेगा। भाजपा के आदिवासी नेताओं में विष्णुदेव साय, रेणुका चौधरी, बस्तर संभाग से निर्वाचित विधायक केदार कश्यप नारायणपुर, लता उसेंडी कोंडागांव, विक्रम उसेंडी अंतागढ़ के नाम सामने आ रहे हैं। अगर भाजपा किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाती है, तो फिर छत्तीसगढ़ में लोकसभा की सभी सीटों पर वह आसानी से चुनाव जीत जाएगी और राज्य की सत्ता भी अगले दस साल तक उसके हाथ से फिसलने वाली नहीं है।

बस्तर में ‘धर्म -युद्ध’ हार गई कांग्रेस

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  • धर्मान्तरण का विरोध न करना भारी पड़ गया सभी प्रत्याशियों को
  • बस्तर के मतदाताओं ने नहीं, आस्था ने हराया कांग्रेस को

अर्जुन झा

जगदलपुर बस्तर संभाग में कांग्रेस चुनाव नहीं, बल्कि धर्म युद्ध में हारी है। कांग्रेस के आला नेताओं द्वारा बस्तर में चल रहे धर्मान्तरण का विरोध न करने की कीमत पार्टी के प्रत्याशियों चुकानी पड़ी है। वहीं धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा यह युद्ध जीत गई। तथाकथित सेक्युलरिज्म के नाम पर विपक्षी गठबंधन के नेताओं द्वारा सत्य -सनातन का अपमान करना भी कांग्रेस को भारी पड़ा है। धर्म निरपेक्षता का मतलब यह नहीं कि अन्य धर्म मजहबों का सम्मान कर एक धर्म विशेष के खिलाफ जहर उगलते रहो। यही भूल कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने की है। यही वजह है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर हिंदू विरोधी होने का तमगा लग गया है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग अंतर्गत नारायणपुर, बस्तर, कोंडागांव, सुकमा, कांकेर, दंतेवाड़ा, बीजापुर सरगुजा जिलों के साथ ही जशपुर, रायगढ़, सरगुजा, अंबिकापुर, कोरबा, धमतरी, राजनांदगांव, मोहला, मानपुर, अंबागढ़ चौकी, कवर्धा, एमसीबी आदि जिलों में भी धर्मान्तरण का खेल लंबे समय से चल रहा है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद छत्तीसगढ़ में धर्मान्तरण को बहुत ज्यादा प्रश्रय मिला है। भाजपा के दिवंगत नेता दिलीप सिंह जूदेव मुखर होकर धर्मान्तरण का विरोध करते और घर वापसी अभियान चलाते रहे। उनकी यह मुहिम आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भाजपा की जड़ें मजबूत करने में सहायक रही। बस्तर में भी कई भाजपा नेता गाहे बगाहे ऐसा ही करते रहे हैं। बस्तर और नारायणपुर जिलों में धर्मान्तरण के खिलाफ आदिवासी समुदाय में अंतर विरोध और संघर्ष की स्थिति निर्मित होती रही है। मूल आदिवासी समुदाय के लोग और उनके समाज प्रमुख धर्मान्तरित आदिवासियों के रीति रिवाजों खासकर अंतिम संस्कार को लेकर विरोध करते रहे हैं। धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासी परिवारों के मृत सदस्यों के अंतिम संस्कार के दौरान कई बार तनावपूर्ण स्थिति भी बस्तर में निर्मित हो चुकी है। कई मामले ऐसे भी आए जबकि पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अफसरों की मौजूदगी में शवों का अंतिम संस्कार संपन्न कराने की नौबत आन पड़ी थी। आदिवासियों के इस अंदरूनी मामले में भाजपा से जुड़े आदिवासी नेता भी कूद पड़े।

फायरब्रांड नेता बन गए केदार कश्यप

नारायणपुर जिले में भाजपा नेता केदार कश्यप और उनके अग्रज दिनेश कश्यप धर्मान्तरण का शुरू से पुरजोर विरोध करते रहे हैं। इस विरोध ने केदार कश्यप की पहचान फायर ब्रांड नेता के रूप में स्थापित कर दी। केदार कश्यप और दिनेश कश्यप के इस तेवर का नतीजा यह हुआ कि आदिवासियों का एक बड़ा तबका उनके साथ हो लिया। वहीं सत्तरुढ़ रही कांग्रेस पार्टी के कई बड़े जिम्मेदार नेता, यहां तक कि मंत्री भी ताल ठोंककर दावा करते थे कि छत्तीसगढ़ में धर्मान्तरण का एक भी मामला नहीं हुआ है। यह बात उन आदिवासियों को नागवार गुजरी, जो अपनी बिरादरी के लोगों के दूसरे धर्म में चले जाने से दुखी रहे हैं। यह नागवारी कांग्रेस के लिए दुश्वारी बन गई। सामाजिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी समुदाय को कांग्रेस से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी। आदिवासियों को नाउम्मीद कर कांग्रेस बड़ी भूल कर बैठी और अपनी उम्मीदों पर उसने खुद पानी फेर डाला। बस्तर के आदिवासी अपनी बिरादरी के लोगों के दूसरे धर्म में पलायन से बड़े दुखी रहे हैं। धर्मान्तरण के कारण सामाजिक अस्तित्व को बचाए रखने की चिंता में पड़े आदिवासियों को केदार कश्यप, दिनेश कश्यप और भाजपा में उम्मीद की किरण नजर आई। कश्यप बंधु चुनाव के कई साल पहले से ही धर्मान्तरण के विरोध में आदिवासियों को लामबंद करने में लग गए थे। इसलिए नहीं कि वे भाजपाई हैं, बल्कि इसलिए कि वे स्वयं भी आदिवासी हैं। अपनी बिरादरी के लोगों को मूल धर्म से विमुख होने से बचाने की चिंता करना केदार कश्यप और दिनेश कश्यप के लिए लाजिमी था। उन्होंने धर्मान्तरण का विरोध करके अपना सामाजिक धर्म ही नहीं निभाया है, बल्कि ‘राज -धर्म’ भी निभाया है। इस धर्म युद्ध में कश्यप बंधु और आदिवासी समुदाय के अन्य प्रमुख जीत की ओर लगातार बढ़ते चले गए। जो आदिवासी पहले कांग्रेस के समर्थक रहे, वे भी कांग्रेस से दामन झटकने लगे।

एक तीर से साध लिए कई निशाने

केदार कश्यप और दिनेश कश्यप ने एक तीर से कई निशाने साध लिए। एक तो अपने समाज के लोगों को भटकने से बचाने में वे कामयाब रहे, दूसरा यह कि आदिवासी बिरादरी को कांग्रेस से विमुख करने में सफल रहे और तीसरा यह कि उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र नारायणपुर के साथ ही पूरे बस्तर में कांग्रेस के आदिवासी वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाकर भाजपा का वोट बैंक और जनाधार काफी बढ़ा लिया। इसकी परिणति नारायणपुर, जगदलपुर, चित्रकोट, कांकेर, दंतेवाड़ा, कोंडागांव, अंतागढ़, केशकाल विधानसभा सीटों पर भाजपा की बंपर जीत के रूप में हुई। बस्तर संभाग की बारह में से चार सीटें ही कांग्रेस बचा पाई। वहीं कांग्रेस के जो आदिवासी नेता विधानसभा जीतने में कामयाब रहे हैं, उन्हें कम मार्जिन से विजय मिली है। बस्तर संभाग की एकमात्र सामान्य विधानसभा सीट पर भी कांग्रेस उम्मीदवार जतिन जायसवाल की अपेक्षा भाजपा प्रत्याशी किरण देव को आदिवासी समुदाय के वोट थोक में मिले हैं। चित्रकोट, दंतेवाड़ा, अंतागढ़, कांकेर, कोंडागांव, केशकाल सीटों पर भी इस धर्म युद्ध की झलक साफ दिखाई दी है।

संस्कार बचाने की थी दरकार

कहते हैं कि जो व्यक्ति या समुदाय अपने संस्कारों से विमुख हो जाता है, वह पूरी बिरादरी के लिए संकट पैदा कर देता है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों की संस्कृति, आस्था स्थलों और पर्व -परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए बहुतेरे जतन किए। करोड़ों रुपए खर्च कर बस्तर संभाग के गांव – गांव में आदिवासियों के पूजा स्थल देवगुड़ी व मातागुड़ियों का जीर्णोद्धार और नई गुड़ियों का निर्माण कराया गया। देव स्थलों के पुजारियों, मोहरियों, बजनियों, सिरहा, गुनिया को मानदेय देने की परिपाटी शुरू की गई। वनभूमि पर निर्मित देवगुड़ियों और मातागुड़ियों के लिए जमीन के अधिकार पत्र जारी किए गए। घोटुलों को पुनर्जिवित किया गया। आदिवासी तीज त्योहारों के आयोजन के लिए अनुदान दिया गया। मगर जिस काम की दरकार थी वह काम नहीं कर पाई कांग्रेस की सरकार। दरअसल आदिवासियों को उनके मूल धर्म से जोड़े रखने के लिए उनमें हो रहे संस्कृति के पराभव को रोकने के लिए उपाय करने थे, जो कांग्रेस की सरकार नहीं कर पाई। बस्तर संभाग में हल्बा, हल्बी, गोंड़, राजगोंड़, भतरा, भतरी, समेत अनेक जातियां आदिवासी समुदाय में समाहित हैं। इन सभी की संस्कृति और संस्कार, रीति रिवाज बड़े ही समृद्ध एवं विशिष्ट हैं। धर्म परिवर्तन के साथ ही संस्कार भी भी बदल जाते हैं। ऐसा ही बस्तर के धर्मान्तरित आदिवासियों के साथ भी हुआ है।

उनका ‘जहर’ भाजपा के लिए अमृत

देशभर के लगभग ढाई दर्जन विपक्षी दलों ने भाजपा के खिलाफ इंडिया गठबंधन खड़ा तो कर लिया, मगर देश की जनता से वे गठबंधन नहीं कर पाए। गठबंधन तैयार होते ही उसमें शामिल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, समाजवादी पार्टी, एडीआईएमके, कम्युनिस्ट व अन्य दलों के नेताओं में हिदुत्व और सनातन धर्म के खिलाफ जहर उगलने की होड़ सी मच गई। कोई सनातन के विनाश की बात कहने लगा, कोई हिंदू और हिदुत्व की अनाप शनाप व्याख्या करने लगा, कोई मंदिर जाने वालों को लड़की छेड़ने वाला बताने लगा तो कोई रामचरित मानस की चौपाइयों की गलत व्याख्या कर सनातन धर्म का अपमान करने लगा। नेताओं द्वारा उगला जाने वाला यह जहर भाजपा के लिए राजनीतिक अमृत बन गया। सनातन और हिंदुत्व पर आस्था रखने वाले लोग ‘मोहब्बत की दुकान’ से उकता गए और उन्हें भाजपा में ही आस दिखने लगी। तीन हिंदी भाषी राज्यों में इसका प्रभाव भी सामने आ गया।

36 घंटे तक कोमा रहे बालक को डॉक्टरों ने दिया नया जीवन

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  •  डेंगू और मलेरिया से पीड़ित बच्चा था बेहोश, 36 घंटे बाद आया होश
  • मेकाज के डॉक्टरों ने ईलाज में दिखाई तत्परता

कोंडागांव जिले के एक बालक को मेकाज के डॉक्टरों ने नया जीवन दिया है। यह बालक 36 घंटे तक कोमा की स्थिति में था और अब तेजी से स्वस्थ होने लगा है।

कोंडागांव जिले के बीरागांव में रहने वाले 13 वर्षीय बालक को अचानक ब्रेन मलेरिया हो गया था। उसे बेहतर उपचार के लिए मेकाज लाया गया। यहां उपचार के दौरान बच्चा डेंगू पॉजिटिव भी पाया गया। बच्चा बेहोश हो गया था। लगातार चिकित्सकों को निगरानी के चलते बालक होश में आने लगा और उठकर बैठ भी गया। अपने कुलदीपक को फिर से जगमगाते देख परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। परिजनों ने इसके लिए चिकित्सकों का धन्यवाद भी ज्ञापित किया। मेकाज के अधीक्षक डॉ. अनुरूप साहू ने बताया कि कोंडागांव के बीरगांव में रहने वाले चमार राम सोरी के 13 वर्षीय बेटे रजनू सोरी को 2 दिसंबर की सुबह सिरदर्द के साथ ही बुखार, पेट दर्द की तकलीफ शुरू हुई थी। परिजन उसे पास के स्वास्थ्य केंद्र ले गए, जहां उसे ब्रेन मलेरिया होना बताया गया। बालक की खराब हालत को देखते हुए उसे मेकाज रेफर किया गया। सुबह 9.30 बजे बालक को मेकाज लाया गया, बच्चे की खराब हालत को देखते हुए तत्काल उसका उपचार शुरू कर दिया गया। उपचार के दौरान अचानक बालक बेहोश हो गया। बच्चे को सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। डॉक्टरों ने उसे 36 घंटे के लिए वेंटिलेटर पर रखवा दिया। जांच के दौरान ही बालक डेंगू से भी पीड़ित पाया गया। बालक ईलाज के दौरान होश में आया। उसे वेंटिलेटर से बाहर निकाल लिया गया। डॉ. डीआर मंडावी, डॉ. पुष्पराज प्रधान, जेआर इंटर्न के अलावा स्टाफ नर्स की मदद से बालक अब ठीक हो गया है।

टांग खिंचाई के चक्कर में डूब गई कांग्रेस की नैया

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  • भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का घोषणा पत्र रहा बीस, फिर भी जनता ने नहीं दिया साथ
  • चंद बड़े नेताओं की स्वार्थ लिप्सा ले डूबी पार्टी को

अर्जुन झा

जगदलपुर चुनावों के पूर्व और चुनावी प्रक्रिया जारी रहने के दौरान छत्तीसगढ़ में बयार कांग्रेस के पक्ष में ही बहती नजर आ रही थी, लेकिन ऐसी कौन सी वजहें थीं कि कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ गया? इस सवाल की तह तक जाने पर कई रहस्ययों पर से पर्दा उठ जाता है। प्रमुख वजह रही कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की एक दूसरे को निपटाने की प्रवृत्ति। इसी प्रवृत्ति ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव, पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू, रविंद्र चौबे, मो. अकबर जैसे धाकड़ नेताओं को हरा दिया। इसके पीछे कौन था, इन नेताओं के उभरने से कांग्रेस के किस नेता को अपने अस्तित्व का खतरा था, इन मसलों पर पार्टी नेतृत्व को न सिर्फ मंथन करना होगा, बल्कि कड़े एक्शन भी लेने होंगे। अन्यथा 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के नतीजे अप्रत्याशित ही नहीं रहे, वरन राजनीति के जानकारों के होश फाख्ता करने वाले भी साबित हुए हैं। निवर्तमान भूपेश बघेल सरकार ने जनता की भलाई के लिए बेहतरीन काम किए, इस बात में शक की कोई गुंजाईश ही नहीं है। किसानों, मजदूरों, महिलाओं, युवाओं, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों समेत सभी वर्गों के हित संवर्धन के लिए ठोस योजनाओं को भूपेश बघेल सरकार ने जमीन पर उतारा था। भूपेश बघेल युवाओं के बीच कका के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे। छत्तीसगढ़ में ‘भूपेश है, तो भरोसा है’ और ‘कका जिंदा हे’ जैसे नारे प्रचलन में आ गए थे। किसान उपज की पर्याप्त कीमत और अंतर राशि मिलने तथा कर्जमाफी से खुश थे। ग्रामीण औद्योगिक पार्को के जरिए उद्यमी बनकर महिलाएं आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो रही थीं और उमंग से भरी थीं। ढाई हजार रु. महीना बेजगारी भत्ता पाकर युवा उत्साहित थे। चार हजार रु. प्रति मानक बोरा की दर से पारिश्रमिक पाकर तेंदूपत्ता श्रमिक आल्हादित थे। महुआ, ईमली समेत तमाम वनोपजों की खरीदी पर्याप्त समर्थन मूल्य पर की जाने और वनभूमि पर काबिज लोगों व निर्मित देव स्थलों को वन अधिकार पट्टे दिए जाने से जंगलों के रखवाले आदिवासी एवं वनवासी उल्लसित थे। भूपेश राज में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग निर्भय होकर जीवन यापन कर रहे थे। यही वजह है कि चुनावों की अधिसूचना जारी होने के पहले तक छत्तीसगढ़ में बस्तर से लेकर कवर्धा और अंबिकापुर तक और राजनांदगांव से लेकर रायगढ़, सरगुजा व कोरबा तक और मोहला, मानपुर, अंबागढ़ चौकी से लेकर जशपुर, जांजगीर तक सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस का जोर और शोर नजर आ रहा था। चुनावों के दौरान भी चारों ओर कांग्रेस का शोर सुनाई दे रहा था। कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने पहुंचे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी की चुनावी सभाओं में उमड़ी भीड़ भी इस बात की तस्दीक करती थी कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की ही लहर है। बस्तर संभाग के जगदलपुर और कांकेर में हुई राहुल गांधी व प्रियंका गांधी की सभाओं में ऐतिहासिक भीड़ देखने को मिली थी। बस्तर की ही धरती से राहुल गांधी ने तेंदूपत्ता की खरीदी 6 हजार रु. प्रति मानक बोरा की दर से करने और हर तेंदूपत्ता श्रमिक परिवार को सालाना चार हजार रु. बतौर बोनस देने की घोषणा की थी। इसकी गूंज सुकमा, कांकेर, कोंडागांव, राजनांदगांव, मोहला मानपुर, अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़, कवर्धा, धमतरी, बालोद, सरगुजा, रायगढ़ आदि तेंदूपत्ता उत्पादक जिलों तक पहुंची थी।

कमतर नहीं था कांग्रेस का घोषणा पत्र

कांग्रेस का चुनावी घोषणा पत्र भाजपा के घोषणा पत्र के मुकाबले जरा भी कमजोर नहीं था, बल्कि भाजपा पर भारी पड़ता प्रतीत हो रहा था। कांग्रेस के घोषणा पत्र में किसानों की कर्जमाफी के साथ ही धान का समर्थन मूल्य 32 सौ रुपए प्रति क्विंटल देने और प्रति एकड़ बीस क्विंटल के मान से धान की खरीदी करने की बात कही गई थी। वहीं भाजपा ने 31 सौ रु. की दर से धान खरीदने की गारंटी दी थी। यानि कांग्रेस धान का मूल्य भाजपा की अपेक्षा 100 रु. ज्यादा देने वाली थी, फिर भी किसानों ने भूपेश और कांग्रेस पर भरोसा क्यों नहीं किया ? उन्होंने मोदी की गारंटी पर ज्यादा यकीन क्यों किया? कांग्रेस की अन्य घोषणाएं भी बीस ही साबित हो रही थीं। बावजूद आम मतदाताओं ने कांग्रेस को क्यों नकार दिया? तेंदूपत्ता श्रमिक भारी भरकम पारिश्रमिक और बोनस राशि से क्यों प्रभावित नहीं हुए? केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा की घोषणा गरीब पालकों और उनकी युवा संतानों को आकर्षित क्यों नहीं कर पाई? मुफ्त ईलाज, दो सौ यूनिट तक मुफ्त बिजली देने का वादा उपभोक्ताओं को क्यों लुभा नहीं पाया? ये तमाम सवाल कांग्रेस को आत्म मंथन के लिए बाध्य कर रहे हैं।

आखिर कौन है कांग्रेस का वह पनौती?

अपनी ठोस और लोक लुभावन घोषणाओं के बावजूद कांग्रेस जनता जानार्दन का दिल जीत नहीं पाई। सरकार में रहते कांग्रेस द्वारा असाधारण काम किए जाने और अगले कार्यकाल के लिए मजबूत इरादों के साथ उतरने के बावजूद मतदाताओं ने कांग्रेस को नकार दिया। कका जिंदा हे, भूपेश है, तो भरोसा है, अबकी बार 75 पार जैसे नारे काफूर हो गए। इससे मन में सवाल उठता है कि कांग्रेस के लिए आखिर पनौती कौन साबित हुआ? जाहिर सी बात है कि यह पनौती कांग्रेस के अंदर ही है। दरअसल कांग्रेस की सबसे बुरी बात यह है कि इस पार्टी के नेता अपनी ही पार्टी के किसी दूसरे नेता को आगे बढ़ते देखना तक फूटी आंख भी पसंद नहीं करते। अपनी लकीर बड़ी करने के बजाय ये नेता सामने वाले की लकीर को मिटाने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। कांग्रेस नेताओं में स्वार्थ लिप्सा इस कदर हावी हो चुकी है कि वे पार्टी हित की चिंता छोड़ स्व हित की चिंता में ज्यादा घुलते रहते हैं। इसी वजह से वे एक दूसरे की टांग खिंचाई में सारी ऊर्जा खपा देते हैं। अपना पार्टी के भीतर और सत्ता में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कांग्रेस के कुछ नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही नेता कांग्रेस के लिए पनौती साबित हो रहे हैं।

बड़े नेताओं को हराने की सुपारी..!

सूत्रों के मुताबिक प्रदेश के ही कांग्रेस के एक बड़े नेता ने राज्य के कई उभरते नेताओं को हराने के लिए अपने चंद खास नेताओं को सुपारी दे रखी थी। इन्हीं सुपारी किलर्स ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे वरिष्ठ नेता टीएस सिंहदेव, पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू, मो. अकबर, अमरजीत भगत, मोहन मरकाम सरीखे धाकड़ नेताओं को हराने में अहम भूमिका निभाई है। सूत्र तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज को बस्तर जिले की चित्रकोट विधानसभा सीट से हराने के लिए बस्तर संभाग से ही आने वाले एक मंत्री और तथा मंडल, निगम व प्राधिकरण में पदों पर आसीन रहे दो नेताओं, एक पूर्व विधायक व कांग्रेस के एक जिला अध्यक्ष को जिम्मेदारी दी गई थी। इन लोगों ने अपने आका के फरमान पर अमल करते हुए दीपक बैज की विजय यात्रा पर विराम लगाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। ऐसा ही हथियार टीएस सिंहदेव समेत प्रदेश की अन्य सीटों से चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के अन्य नेताओं के खिलाफ भी इस्तेमाल किया गया। यदि ये नेता जीत जाते तो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की नजरों में उनका महत्व बढ़ जाता, सीएम पद के लिए आदिवासी, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, ओबीसी व सामान्य वर्ग से कई दावेदार सामने आ जाते। झीरम घाटी नक्सली नर संहार में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं का मारा जाना भी संभवतः इसी वर्चस्व की लड़ाई का अंजाम रहा होगा।

इस खाई को पाटने भाजपा को बनना पड़ेगा दशरथ मांझी

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  • बस्तर के कांग्रेसी कब्जे वाले क्षेत्रों के लोगों का दिल जीतने दिखाना होगा बड़ा दिल
  • जीत लिया पूरा बस्तर, तो जीत लेंगे पूरा छत्तीसगढ़

अर्जुन झा

जगदलपुर भगीरथी की मेहनत और लगन को तो पूरा भारत वर्ष अच्छे से जानता है। ऐसे ही कलयुग में एक भगीरथ पैदा हुए, जिन्हें हम दशरथ मांझी के नाम से जानते हैं। दशरथ मांझी ने अपने गांव के लोगों को जल संकट और दूसरी समस्याओं से मुक्ति दिलाने के लिए अकेले ही पहाड़ का सीना चीर डाला था। कुछ ऐसा ही जतन अब बस्तर में भाजपा को करना पड़ेगा। बस्तर में जो खाई रह गई है, उसे पाटने के लिए भाजपा के नेताओं को दशरथ मांझी बनना पड़ेगा और कांग्रेसी कब्जे वाले बस्तर संभाग के विधानसभा क्षेत्रों के लोगों का दिल जीतने के लिए बड़ा दिल दिखाना होगा। तभी बस्तर में भाजपा के लिए रामराज्य आ पाएगा।

हालिया निपटे विधानसभा चुनावों में बस्तर संभाग की सीटों के नतीजे 75 -25 वाले आए। ये नतीजे भाजपा के लिए उम्मीदों भरे रहे हैं। इस आधी 75 फीसदी उम्मीद को शत प्रतिशत पूरी करने के लिए भाजपा के बड़े नेताओं और यहां से चुने गए विधायकों को वैसा ही कड़ा परिश्रम करना पड़ेगा तथा वैसा ही बड़ा दिल दिखाना होगा जैसा कि बिहार के अनपढ़ ग्रामीण दशरथ मांझी ने किया और दिखाया था। बस्तर की इस पटकथा को पूरा करने के लिए बिहार के एक छोटे से गांव के निवासी बुजुर्ग दशरथ मांझी की कहानी का उल्लेख जरूरी है। बस्तर संभाग की चित्रकोट, जगदलपुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, कांकेर, अंतागढ़ केशकाल और कोंडागांव विधानसभा सीटों पर ही भाजपा फतह कर पाई। बस्तर, बीजापुर, कोंटा सुकमा और भानुप्रतापपुर सीटों पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार है। 2018 के पहले तक बस्तर में भाजपा का एकछत्र साम्राज्य हुआ करता था। 2018 के विधानसभा चुनावों में चली कांग्रेस की आंधी ने भाजपा की चूलें हिलाकर रख दी। बस्तर संभाग की बारह में से एक भी सीट भाजपा जीत नहीं पाई और यहां से भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। संभाग के सुकमा जिले की कोंटा विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अजेय योद्धा कवासी लखमा जीत का छक्का लगाने में कामयाब रहे। बस्तर सीट पर लखेश्वर बघेल कांग्रेस के टिकट पर दूसरी दफे जीतकर आए हैं। बीजापुर में कांग्रेस के विक्रम मंडावी रिपीट हुए हैं। भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट पर उप चुनाव जीतने वाली सावित्री मनोज मंडावी ने यह आम चुनाव जीता है। कांग्रेसी वर्चस्व वाले इन चारों विधानसभा सीटों पर अब भाजपा के नव निर्वाचित विधायकों, सांसदों और नेताओं को विशेष रूप से फोकस करना होगा।

ये है दशरथ मांझी की असल कहानी

बिहार राज्य के निवासी दशरथ मांझी का गांव सड़क, पेयजल, बिजली, चिकित्सा, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित था। पानी की व्यवस्था के लिए भी गांव की महिलाओं को पहाड़ की ऊंची चढ़ाई कर दूसरे गांव में जाना पड़ता था। सड़क के बिना दूसरी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा सक रही थीं। सड़क इसलिए नहीं बन पा रही थी क्योंकि ऊंचा पहाड़ रोड़ा बनकर खड़ा था। कोई ग्रामीण बीमार पड़ जाए, तो फौरी ईलाज मयस्सर नहीं हो पाता था। बच्चे तालीम हासिल नहीं कर पाते थे। अंधेरे में ग्रामीणों को गुजर बसर करना पड़ता था। दशरथ मांझी की पत्नी को भी पानी के इंतजाम के लिए रोज रोज पहाड़ की चढ़ाई करनी पड़ती थी। दशरथ मांझी को अपनी पत्नी और गांव वालों की यह तकलीफ देखी नहीं जाती थी। उसने गांव के विकास में रोड़ा बने पहाड़ की छाती को छलनी करने का फैसला कर लिया। मजबूत इरादों के साथ दशरथ मांझी ने छेनी हथोड़ी लेकर शुरू कर दिया भगीरथी प्रयास। कई साल की मेहनत रंग लाई और दशरथ मांझी पहाड़ को चीरकर सड़क बनाने में सफल हो ही गए। सड़क बनने के बाद पूरे गांव वालों की जीवनचर्या आसान हो गई। दशरथ मांझी की इस बेमिसाल पहल की चर्चा पूरी दुनिया में होने लगी। उनकी इस जानदार जांबाजी पर फीचर फिल्म भी बनी, जो लोकप्रिय रही।

इन्हें निभाना पड़ेगा पड़ोसी धर्म

बस्तर संभाग के आठ भाजपा विधायकों किरण देव जगदलपुर, विनायक गोयल चित्रकोट, केदार कश्यप नारायणपुर, विक्रम उसेंडी अंतागढ़, चैतराम अटामी दंतेवाड़ा, लता उसेंडी कोंडागांव, नीलकंठ टेकाम केशकाल और कांकेर लोकसभा क्षेत्र के सांसद सोहन पोटाई को बड़ा दिल दिखाना होगा। इन सभी को अच्छे पड़ोसी की भूमिका निभाते हुए उन विधानसभा क्षेत्रों के निवासियों की तकलीफ दूर करने और गांवों के विकास पर पूरा ध्यान देना होगा। दलगत भावना से ऊपर उठकर काम करेंगे, तभी भाजपा के लोग इन क्षेत्रों के लोगों का दिल जीत पाएंगे। जगदलपुर के विधायक किरण देव और नारायणपुर के विधायक केदार कश्यप को बस्तर क्षेत्र के गांवों, चित्रकोट के विधायक विनायक गोयल को अपने निर्वाचन क्षेत्र की सीमा से लगे दीगर विधानसभा क्षेत्रों के गांवों, दंतेवाड़ा के विधायक चैतराम अटामी को पड़ोसी जिले बीजापुर और सुकमा के गांवों, कोंडागांव विधायक लता उसेंडी, कांकेर विधायक एवं केशकाल के विधायक नीलकंठ टेकाम को भानुप्रतापपर क्षेत्र के गांवों के विकास के लिए भी समर्पित होकर काम करना पड़ेगा।

संतोष पाण्डेय पर भी बड़ी जिम्मेदारी

बस्तर संभाग की 75 प्रतिशत सीटों पर विजय हासिल करने में भाजपा के प्रदेश प्रभारी ओम माथुर और संभाग प्रभारी एवं राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र के सांसद संतोष पाण्डेय की अहम भूमिका रही है। श्री माथुर और श्री पाण्डेय बस्तर संभाग में विधानसभा चुनावों के कई माह पहले से ही प्रण प्राण से जुट गए थे। उन्होंने सुस्त पड़ चुके पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार किया, उन्हें धरातल पर उतारा। समय समय पर ओम माथुर ने पार्टी नेताओं की बैठकें लेकर उन्हें रिचार्ज किया। वहीं संतोष पाण्डेय संभाग के नेताओं के साथ आदिवासियों के बीच लगातार पहुंचते रहे, उन्होंने आदिवासियों के घरों में बैठकर उनके परिजनों के साथ भोजन किया। इस तरह संतोष पाण्डेय आदिवासियों का दिल जीतने में कामयाब रहे। अब राजनांदगांव का सांसद और पार्टी के बस्तर संभाग प्रभारी होने के नाते संतोष पाण्डेय पर दोहरी जिम्मेदारी आन पड़ी है। बस्तर लोकसभा क्षेत्र के सीमावर्ती दर्जनों गांव राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के मोहला, मानपुर, अंबागढ़ चौकी जिले की सीमा से लगे हुए हैं। अतः श्री पाण्डेय को भी पड़ोसी धर्म निभाना होगा।

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